बुंदेलखंड संस्कृति

मंदिरों के नाम

जैन मंदिरों के नाम

पार्श्वनाथ का मंदिर
पार्श्वनाथ मंदिर की अन्य विशेषताएँ
पार्श्वनाथ मंदिर में वर्तमान प्रतिमाओं की संख्याएँ निम्नलिखित है
शांति नाथ का मंदिर
आदिनाथ का मंदिर
आदिनाथ मंदिर परिसर में स्थित एक अन्य लघु मंदिर
घंटाई मंदिर

पार्श्वनाथ का मंदिर

पूर्वी समूह के अंतर्गत पार्श्वनाथ मंदिर, खजुराहों के सुंदरतम मंदिरों में से एक है। ६८' लंबा ६५' चौड़ा यह मंदिर एक विशाल जगती पर स्थापित किया गया है। मूलतः इस मंदिर में आदिनाथ की प्रतिमा थी। वर्तमान में स्थित पार्श्वनाथ प्रतिमा उन्नीसवीं शताब्दी के छटे दशक की है। इस प्रकार यह मंदिर आदिनाथ को समर्पित है।

प्राप्त शिल्प, वास्तु तथा अभिलेखिक साक्ष्यों के आधार में पर इस मंदिर का निर्माण ९५० ई. से ९७० ई. सन् के बीच यशोवर्मन के पुत्र और उत्तराधिकारी धंग के शासनकाल में हुआ। इसके निर्माण में काफी समय लगा। मंदिर एक ऊँची जगती पर स्थित है, जिसकी मूल सज्जा अब लगभग

समाप्त हो गई है। मंदिर के प्रमुख भागों में मंडप, महामंडप, अंतराल तथा गर्भगृह है। इसके गिर्द परिक्रमा मार्ग का भी निर्माण किया गया है। मंडप की तोरण सज्जा में अलंकरण और मूर्तियों की बहुलता है। इसमें शाल भंजिकाओं, अप्सराओं और पार्श्वदेवी की मूर्तियाँ भी है। इसका वितान उलटे कमल पुष्प के समान है। वितान के मध्य में एक फुंदना झूल रहा है, जिसपर उडते हुए विद्याधरों की आकृतियाँ उत्कीर्ण की गई है। मंडप से मंदिर में प्रवेश करने के लिए सप्तशाखायुक्त द्वार हैं। इसके अंदर अलंकरण हिरकों, पाटल- पुष्पों, गणों, व्यालों, मिथुनों, बेलबूटों के अतिरिक्त द्वारपाल सहित मकरवाहिनी गंगा और कूमवाहिनी यमुना की आकृतियाँ उत्कीर्ण है। विभिन्न मुद्राओं में गंधर्व और यक्ष मिथुन ढ़ोल, तुरही, मंजिरा, शंख, मृदंग तथा ततुंवाद्य बजाते हुए सरितदेवियों के ऊपर तोरण तक अंकित किये गए हैं।

मंडप की दीवार को भीतर से कुड्यस्तंभ का बाहर से मूर्तियों को तीन पंक्तियों का और मंदिर के अंतरंग भागों को प्रकाशित करने के लिए बनाए गए वातायनों का आधार प्राप्त है। इस मंदिर के भीतरी भाग की विशेषता यह है कि इसमें कुड्यस्तंभों के बीच के रिक्त स्थान का उपयोग आठ- उप- वेदिकाओं की रचना में किया गया है, जिन पर भव्य और सुंदर परिकर के साथ तीर्थकर प्रतिमाएँ स्थापित की गई है। मंडप से जुड़ा हुआ इसका गर्भगृह है। गर्भगृह में दिगंबर जैन साधु तथा साधवी वस्रहीन अवस्था में दिखाए गए हैं। इसके अतिरिक्त गर्भगृह में एक केंद्रीय स्री प्रतिमा है। मंदिर के अंतराल में बाईं ओर कमल और कलश के साथ- साथ अभय मुद्रा में चतुर्भुज शासन देवी तथा दायीं ओर चतुर्भुज वीणावादिनी अंकित है।

मंदिर के चारों ओर अनगिनत प्रतिमाएँ हैं, जो तीन पालियों में हैं। नीचे की दो पालियों की प्रतिमाएँ उतिष्ठ मुद्रा में है, जबकि ऊपरी पाली में उड़ती हुई या बैठक मुद्रा की प्रतिमाएँ स्थापित है। ये प्रतिमाएँ सूक्ष्म संगतराशी की आदर्श दिखाई देती है। प्रसाधन, कंटक भेटन, पत्रलेखन इत्यादि दिनचर्या के कार्यों में व्यस्त सुंदरियाँ अद्भूत है। खजुराहो मूर्तिकला की अद्भूत कृति पैरों में लाख लगाती तरुणी भी इसी मंदिर में अंकित की गई है। पार्श्वनाथ मंदिर की मूर्तियों की विशेषताओं में से एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यहाँ की मूर्तियों में नारियों को आमंत्रण और आर्कषण में चतुर अंकित किया है।

खजुराहो के जैन मंदिरों में पावनतम मंदिर की बाहरी दीवारों पर शैव तथा वैष्णव प्रतिमाओं का अंकन इस बात का सुचक्र है कि यह मंदिर विश्वधर्म के परिचायक होंगे।

मंदिर की रुप रेखा अपने आप में विशेष है। मुख चतुष्कि गूढ़मंडल के भीतर खुलती हे। इसके गूठमंडल की चौखट अलंकरण में अद्वितीय है। मंदिर के जैन मंडप का वितान बहुत सुंदर है। इसमें बड़ी सावधानी से बारीक नक्काशी की गई है। इसके महामंडप और गर्भगृह की छतों को जोड़कर शिखर की स्थापना की गई है। प्रतिमाओं की पट्टियाँ लगातार क्रम में स्थापित की गई है। ऊपरी पट्टी पर देवांगनाएँ तथा मिथुन इसी मंदिर में हैं। सर्वश्रेष्ट श्रेणी के मिथुन के रुप देखने योग्य हैं। सर्वोपरि पट्टी पर मूर्तियों का आकार छोटा हो गया है। बीच की पट्टी में भी मिथुन मूर्तियों का बहुतायत है।

पार्श्वनाथ मंदिर का जंघा भाग भी अति सुंदर नारियों के अंकन से समृद्ध है। इसके सभी ओर भद्र हैं, जिनपर पाँच- पाँच रथिकाएँ हैं। जैन प्रतिमाएँ केवल बाहरी रथिकाओं पर ही निर्मित है, शेष स्थानों पर तथा कथित ब्राह्मणत्व प्रभाव की प्रतिमाएँ अंकित हैं। यहाँ छोटे- छोटे छज्जों या विश्रांतियों से प्राप्त किए गए छोटे रथ भी हैं। इन छज्जों पर जंघा की देव, अप्सरा तथा विद्याधर प्रतिमाएँ हैं। जंघा पर तीन पंक्तियों में प्रतिमाएँ स्थापित की गई है। यहाँ की जंघा का विभाजन पट्टिकाओं से किया गया है।

मंदिर के शिखर के लिए दक्षिणी ओर गर्भगृह पर भद्र हैं, जो उद्गमों के रुप में पार्श्वलिंदों पर उतरते हैं। पार्श्वालिंदों के ऊपर रथिकाएँ हैं, जो प्रमुख विश्रांतियों के ऊपर तक गई है। इस स्थान पर उरु: श्रृंग और मूलमंजरी का रुप लेते हैं। करण श्रृंगों के साथ ऊपरी पार्श्वालिंदों पर श्रृंग हैं। केंद्रीय श्रृंग पंचरथ प्रकृति का है तथा शेष त्रिरथ प्रकृति का है। मूलमंजरी सप्तरथ प्रकृति का है तथा ग्यारह भूमि युक्त है। मूलमंजरी के दोनों ओर दो- दो उरु: श्रृंग हैं। करणश्रृंग का ऊपरी भाग उरु: श्रृंगों की सतह से ही शुरु होता है। दोनों ओर कुल बारह करण श्रृंग है।

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पार्श्वनाथ मंदिर की अन्य विशेषताएँ

१. अर्धमंडप के अधिष्ठान की सज्जापट्टी पर हाथियों की प्रक्षेपित पट्टी उत्कृष्ट है।
२. भूत टोड़ा, कीर्तिमुख, शालमंजिका टोड़ा, नाग प्रतिमाएँ यहाँ वर्तमान है।
३. कीर्तिमुख तथा विद्याधर एक प्रस्तर की श्रृंखला के तंतु से जुड़े हुए हैं।
४. शाखाओं की सज्जा मंदार पुष्प, व्याल, मिथुन तथा बेलबूटों से ही गई है।
५. इसका द्वार पंचशाला प्रकृति का है।
६. खार पत्थर की कुर्सी पर पार्श्वनाथ की काली प्रतिमा है।
७. यहाँ ॠषभनाथ के प्रतीक ॠषभ उपस्थित हैं।
८. इसमें हृदयाकार पुष्पों वाली शोभापट्टी वर्तमान है।
९. जंघा की उपरी पंक्ति में मूर्तियों के मध्य चैत्य मेहराबों के उद्गम है तथा जंघा पर उत्कीर्ण तीनों पंक्तियों का शिल्प मूर्तिकला का श्रेष्ठ उदाहरण है।
१०. जैन मंदिर के बावजूद, इस में हिंदू धर्म के परशुराम, बलराम, रेवती, राम-सीता- हनुमान तथा विष्णु के अनेक रुप की मूर्तियाँ अंकित की गई हैं।
११. केवल पार्श्वनाथ मंदिर में ही कृष्ण लीला से संबंधित दृश्य उत्कीर्ण है।
१२. इसमें गर्भगृह के भीतर भी हिंदू मंदिर परंपरा का पालन किया गया हे।
१३. इस मंदिर की मूर्तियों का वर्तूलाकार प्रतिरुपण और सामान्य रुप रेखा केशविन्यास उत्कृष्ट है।
१४. यहाँ शिर्षतोरण तथा कृशकाय, वायोवृद्ध, ज्ञानवृद्ध तथा तपोधन अठारह दिगंबर मुनियों से वंदित अर्हत प्रतिमाएँ सुशोभित हैं।

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पार्श्वनाथ मंदिर में वर्तमान प्रतिमाओं की संख्याएँ निम्नलिखित है-

- चतुर्भुज इंद्र, अग्नि, व्याल २८
- चतुर्भुज देवी ०३
- अप्सरा १६
- चतुर्भुज शिव १४
- खड़ी हुई नारी, लक्ष्मीनारायण ०८
- यम, नृति, त्रिभंगी मुद्रा में नारी ०२
- काम, जिन पद्यप्रभु, चतुर्भुज विष्णु ०९
- दाढ़ी युक्त संत, देव- युक्त १६
- नारीफल तथा रुमाल के नारी ०२
- त्रिभंगी मुद्रा में देव- युग्म ०५
- पक्षी के साथ अप्सरा मानवयुग्म ०७
- नारी कमल पुष्प के साथ ०२
- द्विबाहु कृष्णा, जिन परशुराम ०२
- ब्रह्म ०३
- इशान, चतुर्भुज देव सपत्नीक ०३

उपर्युक्त में कोष्टकों में दी गई संख्या कृति विशेष प्रतिमाओं की संख्या है। इसके अतिरिक्त उत्तरी पश्चिमी कोने के उत्तरी मुख पर काम और रति की एक सुंदर प्रतिमा है। काम के हाथ में पक्षी है, तीन बाण मानव सिर समेत ऊपरी हाथ में है। यह प्रतिमा बाएं हाथ से रति को थामें हुए हैं। इसके दूसरे हाथ में धनुष है। बाहरी भाग में दो प्रतिमाएँ सेविकाओं की है, जो स्वतंत्र तराशी गई हैं। रथिकाओं पर पाँच वातायन भी स्वतंत्र हैं और उन पर प्रतिमाएँ रखना संभव नहीं है। ऐसा कहा जा सकता है कि यह मंदिर प्रतिमाओं की विविधता में सर्वप्रथम है।

भीतरी भाग में महामंडप के द्वार पर चक्रेश्वरी की एक ललित प्रतिमा विद्यमान है, वह किरीट मुकुट पहने हैं। उसके दहिने चतुर्भुज सरस्वती है। वराह व हंस इसके साथ- साथ है, जबकि दूसरी और ऐसा ही अन्य प्रतिमा वाहन विहीन हैं। इसका द्वारपाल पुस्तक एवं गडा धारण किए है। गर्भगृह के द्वार पर गंगा- यमुना दोनों ओर है। भीतरी परिक्रमा के छज्जों पर देव, अप्सरा तथा विश्रांति पर व्याल प्रतिमाएँ वर्तमान है।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि यह मंदिर वस्तुतः देवताओं का संग्रहालय है। अधिकांश देव गंधर्व, किन्नर, यक्ष, अप्सराएँ यहाँ मूर्ति रुप में उपस्थित है। देवों की अनेक श्रेणियाँ व प्रकार हैं। मूर्तिकार के पास समय और स्थान होता है, तो संभवतया ८४ करोड़ देवता जमीन पर उतर आते। मंदिर की प्रतिमाएँ सुंदर है और बड़े भक्ति भाव से धर्म की सार्वभौमिकता को चरितार्थ करती है।

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शांति नाथ का मंदिर

जैन धर्म से संबंधित शांतिनाथ मंदिर का निर्माण काल १०२८ ई. सन् है। मंदिर का मुख पूर्वी ओर है। इसमें भगवान शांतिनाथ जी की १४' ऊँची प्रतिमाएँ विद्यमान हैं। मंदिर के तीन ओर खुला प्रांगण है, जहाँ लघु मंदिर में अन्य जैन प्रतिमाएँ स्थापित की गई है। मंदिर द्वार के दोनों ओर दो शाखाओं में द्वार की चौखट पर मिथुन विराजमान है। स्थानीय मतों के अनुसार मंदिर का वास्तविक द्वार नष्ट हो जाने के पश्चात निर्मित किया था, अतः यहाँ वर्तमान काल में मूर्तियाँ सही क्रम में तथा अपने वास्तविक स्वरुप में स्थापित नहीं हो पाई है। मंदिर का शिखर भाग भी प्राचीन नहीं दिखाई देता है, इसलिए कुछ इतिहासकार इसे आधुनिक जैन मंदिर मानते हैं। मंदिर की पुरातन मूर्तियों और प्रस्तरों को सजाकर वर्तमान रुप दिया गया है।

यह एक मंदिर समूह है, जहाँ कुछ अन्य छोटे- छोटे जैन मंदिर भी है। इन लघु मंदिरों का मूल रुप लुप्त हो गया है। मंदिर का गर्भगृह शेष है, जो पार्श्वनाथ जी के मंदिर के जैसा है। मंदिर की पुरानी प्रतिमाएँ इधर- उधर से इकट्ठी कर संग्रहालय में पहुँच गई है।

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आदिनाथ का मंदिर

पुरातत्व रुचि का महत्वपूर्ण आदिनाथ मंदिर १००० ई. सन् के आस- पास का है। मंदिर
निरंधार- प्रासाद तथा सप्तरथ प्रकृति का है। यह मंदिर ऊँची जगती पर निर्मित है एवं पार्श्वनाथ से मिला हुआ है। सामान्य योजना, निर्माणशैली तथा शिल्प शैली में यह छोटा- सा मंदिर वामन मंदिर के समान ही है।

मंदिर के जंघा में मूर्तियों की एक पर एक तीन पंक्तियाँ हैं। सबसे ऊपरी पंक्ति की मूर्तियाँ आकार में कुछ छोटी है। इस पंक्ति में प्रक्षेपों या उभरे भागों पर विद्याधरों तथा भीतरी भागों पर गंधर्वों और किन्नरों का अत्यंत जीवंत प्रतिमाएँ अंकित की गई है। उन्हें पुष्पमालाएँ ले जाते हुए या संगीत- वाद्य बजाते हुए या शस्र चलाते हुए देखाया गया है। शेष दो पंक्तियों के प्रक्षेपों पर शासनदेवताओं, यक्ष मिथुनों तथा सुरसुंदरियों का और भीतर धंसे भागों पर व्यालों का अंकन किया गया है। मूर्तियों की अलंकरण पट्टियों की देव कुलिकाओं में अनेक प्रतिमाएँ प्रतिष्ठित हैं। इनके वाहनों, आयुधों और परिकारों का अत्यंत सजीव और सुक्ष्म किया गया है। इन सज्जापट्टियों की एक अन्य विशेषता यह भी है कि इनके कोणों पर प्रथम तीर्थकर आदिनाथ के शासन सेवक गोमुख या गोवदन यक्ष का अत्यंत सुंदर तथा विलक्षण अंकन किया गया है।

मंदिर का शिखर सप्तरथ तथा इसमें सोलह भूमियाँ हैं, जिनका संकेत भूमि आमलकों से मिलता है। प्रत्येक आमलक पर कपोत का उष्णीय है। कर्णट में एक खड़ी पट्टी है, जिसमें निचली राथिका में हीरकों सहित चैत्य मेहराब है। यहाँ के सभी रथ मूल रुप से परिधि रेखा से आगे निकलते हैं। मध्यवर्ती तथा पार्श्ववर्ती रथों के ऊपर क्रमशः कीर्तिमुख तथा अर्द्धकीर्तिमुख है। कर्णरथों के ऊपर एक लघु स्तूपाकार शिखर है, जिसमें दो पीढ़े हैं तथा चंद्रिकाएँ हैं। परिधि रेखा के ऊपर एक बड़े आकार का धारीदार आमलक दो चंद्रिकाएँ एक छोटा आमलक चंद्रिका और कलश है। कलश के ऊपर एक पुष्पालंकरण भी दिखाई देता है। अंतराल की छत एक श्रृंखला है, जिसके ऊपर एक उद्गम है। इसके ऊपर क्रमशः ऊर्ध्वोंन्मुखी तीन श्रेणियों वाला शिखर है। इस शिखर को कमलपत्र और रत्नपत्र से अलंकृत किया गया है। इसमें सात देवकुलिकाओं की एक पंक्ति है। बीच की देवकुलिका में, एक यक्षी की खडगासन प्रतिमा है, जिसके दोनों पार्श्वों में आवरण देवताओं की मूर्तियाँ हैं। देवकुलिकाओं के ऊपर त्रिकोण शीर्षों की आरोही पंक्तियाँ हैं। इसके अधिष्ठान पार्श्व में दोनों लघु स्तुपाकार शिखर पर हाथी पर आक्रमण करते हुए सिंह का अंकन किया गया है।

गर्भ द्वार सात शाखाओं वाला है। पहली शाखा का अलंकरण पत्रलता से किया गया है। दूसरी शाखा और चौथी शाखा का संगीत वाद्य बजाते हुए गणों से किया गया है। तीसरी शाखा का, वाहन सहित आठ शासन देवियों से, पाँचवीं का पुष्पगुच्छ से, छठी का व्यालमुख निसृत पत्रलताओं से और अंतिम या सातवीं का एक विशेष प्रकार की वर्तुलकार गुच्छा रचना से किया गया है। द्वारमार्ग का सरदल स्तंभ शाखाओं पर आधारित है, जिसकी पाँच देवकुलिकाओं में शासनदेवी का अंकन किया गया है। इनके हाथों में शंख, कमल, कलश, पाश आयुध है। इन देव कुलियों के ऊपर उदगम है। द्वारमार्ग के अधिष्ठान पर वाहन सहित गंगा- यमुना और द्वारपाल अंकित किया गया।

स्तंभों का निचला भाग चतुर्भुज द्वारपालों से और बीच का भाग हीरक आकृतियों और घटपल्लवों से सज्जित किया गया है। स्तंभ शीर्ष पर आमलक और पद्य हैं, जिन पर आलंबनबाहु टिके हुए हैं। आलमबंन बाहुओं के कोनों में भक्तिविभोर नाग निर्मित किया गया है। द्वारतोरण पर शची द्वारा सेवित, तीर्थकर की माता को शयन करते हुए अंकित किया गया है। इसके बाद माता को सोलह स्वप्न दिखाए गए है। यद्यपि ये सोलह मंगल प्रतीक स्वप्न जैन मंदिरों में प्रायः अंकित किए जाते हैं, किंतु स्वप्न देखती हुई जन्नी के साथ में उसका अंकन, आदिनाथ मंदिर की एक अति- महत्वपूर्ण विशेषता है।

मंदिर का गर्भगृह अत्यंत सादा है, जिसमें प्राचीन प्रतिमा के स्थान पर आदिनाथ की अर्वाचीन मूर्ति प्रतिष्ठित है।

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आदिनाथ मंदिर परिसर में स्थित एक अन्य लघु मंदिर

घंटाइ मंदिर

भव्य नक्काशी तथा उत्कृष्ट कला का अमूल्य धरोहर, घंटाई मंदिर का निर्माण १०८५ ई. सन् में हुआ। ४५' लंबे २५' चौड़े अधिष्ठान पर १४' ऊँचे १८ स्तंभों वाला यह मंदिर, बुद्ध प्रकृति का मंदिर माना जाता है। यह मंदिर पूर्वी समूह के मंदिरों में प्रमुख है। जैन धर्म से संबंधित घंटाई मंदिर का अनुपम साज- सज्जा तथा उत्कृष्ट सौंदर्य इस समूह के दूसरे मंदिरों से अलग प्रकार का है।

स्तंभों पर झुमते घंटों और क्षुद्र घंटिकाओं की मनोहर एवं जीवंत संयोजना के कारण, स्थानीय लोग इसको घंटाई मंदिर के नाम से पुकारते हैं। मंदिर की पृष्ठ भूमि में महावीर की माता श्री के सोलह स्वप्नों और नवग्रहों का विवरण है। मंदिर का अधिकांश भाग वर्तमान समय में अनुपलब्ध है, जबकि छत और शानदार स्तंभ, अब भी वर्तमान हैं। स्तंभों को कीर्तिमुखों से सुसज्जित किया गया है। अष्टभुजा युक्त जैन देवी गरुड़ पर सवार अनेक अस्र- शस्र लिए द्वार शाखा पर उपस्थित हैं। मंदिर का मंडप गूढ़ मंडप प्रकृति का है, जिसपर वितान, सादा बना हुआ है। छत के बीम कलात्मक सज्जायुक्त हैं। इन धरणों पर घंटियों की मालाएँ बनाई गईं हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ शार्दूल और कीर्तिमुख भी रेखांकित हैं।

अर्धमंडप तथा महामंडप चार- चार स्तंभों पर आधारित है। स्तंभों के मध्य भाग तल में अष्टकोणीय, बीच में सोलह कोणीय तथा सबसे ऊपर वर्तुलाकार बना हुआ है। प्रत्येक स्तंभ के ऊपर एक गोल शीर्ष है, जिसमें दांतेदार आमलक और पद्य अंकित हैं। सभी कीचकों के पेट में छेद बनाए गए हैं, ताकि उसमें अप्सराओं के आलंबनबाहू को फंसाया जा सके। आलंबनबाहु पर एक सरदल है। इस सरदल पर अनेक भक्तों, संगीतकारों, नर्तकों तथा शोभायात्राओं में सम्मलित हाथियों से अंकित एक चित्रवल्लरी बनाई गई है। चित्रवल्लरी के ऊपर एक अलंकृत समतल और चौकोर वितान वर्तमान है। इस वितान के किनारों का अलंकरण कमल लताओं से किया गया है। वितान के फलकों की सज्जा नर्तकों, गायकों, मिथुनों तथा गजतालुओं से की गई है।

महामंडप, अर्धमंडप के आगे है। वर्तमान समय में इसमें दीवारें अनुपस्थित हैं। पार्श्वनाथ मंदिर के विपरीत, इसमें सामने की ओर एक आड़ी पंक्ति में तीन चतुष्कियाँ हैं। इन चतुष्कियों का वितान सादा है। महामंडप के द्वारपाश्वों की भित्तियों की आधार वेदियों पर आमने सामने मुख किए दो सशस्र द्वारपाल अंकित किए गए हैं। वे करंड मुकुट धारण किए हुए हैं तथा गदाधारी हैं। इसकी उपपीठ धार- शिला से बनी हैं। महामंडप के द्वार की सात शाखाएँ हैं -- शाखाएँ पुष्प, चक्र, व्याल, गण, मिथुन, कर्णिक, पद्य इत्यादि से सजाई गई है। इनमें प्रस्तर बेलबूटों को भी सजाया गया है। तृतीय तथा पंचम द्वार शाखा पर मिथुन हैं। पहली शाखा का अलंकरण फुल्लिकाओं से तथा दूसरी शाखा एवं छठी शाखा का व्यालों से किया गया है। चौथी शाखा में कर्णिका और कमल इसी स्तंभशाखा पर एक सरदल हैं, जिसके मध्य में गरुड़ासीन अष्टभुजी चक्रेश्वरी अंकित की गई

है। उनके हाथों में फल, बाण, चार चक्र, धनुष और शंख हैं। सरदल के दोनों किनारों पर तीथर्ंकर प्रतिमाएँ और नवग्रहों की प्रतिमाओं अंकित की गई है तथा द्वार मार्ग को आवृत करने वाली सातवीं शाखा में सर्पिल बेलबूटों तथा उसके पार्श्व में एक खड़ी चित्रवल्लरी का अंकन किया गया है।

द्वारमार्ग के अधिष्ठान पर सरितदेवियों :- गंगा तथा यमुना का आमलक है। महामंडप का मध्यवर्ती वितान चार स्तंभों पर आधारित है।। प्रत्येक स्तंभ पर तीन दीवट आलंवनबाहु हैं। सरदल पर तीन सज्जा पट्टियाँ उपस्थित हैं। पहली पट्टी में एक दूसरे से आबद्ध श्रृंखलाएँ, दूसरी पट्टी में त्रिकोण और तीसरी पट्टी सादी है। इसके ऊपर समतल वितान उपस्थित है। रथिकाओं पर जिन प्रतिमाएँ अंकित है। अष्टधातु नवग्रह, वृषभ मुखी देव, ऐरावत, हरित, शेर, श्रीदेवी, सुर्य इत्यादि की प्रतिमाएँ वर्तमान है। इसके अतिरिक्त, यहाँ नाग अग्नि की प्रतिमाएँ भी अंकित है। गंगा- यमुना द्वार पर द्वारपाल, सरस्वती, जलदेवता, गजशार्दुल प्रतिमाएँ नृत्य और संगीत दृश्यों के साथ अंकित की गई है।

 

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Content prepared by Mr. Ajay Kumar

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