छत्तीसगढ़

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ठाकुर प्यारेलाल सिंह

ठाकुर प्यारेलाल सिंह के बारे में छत्तीसगढ़ में एक कहावत प्रचलित है -

गरीबों का सहारा है,

वही ठाकुर हमारा है।

सन् था 1920 । राजनन्दगांव में मिल मजदूरों ने हड़ताल की थी जो 37 दिनों से भी ज्यादा चली थी और मिल अधिकारियों को मजदूरों की सभी मांगें मंजूर करनी पड़ी थीं। वह हड़ताल ठाकुर प्यारेलाल के नेतृत्व में हुई थी। ऐसा कहा जाता है कि पूरे देश में वह पहली हड़ताल थी जो 37 दिनों से भी ज्यादा चली थी। उस हड़ताल के कारण मजदूरों को एक लाख रुपये (वार्षिक) लाभ हुआ था और काम के घंटे कम कर दिये गये थे।

इसके ठीक चार साल पहले अर्थात् सन 1916 में ठाकुर प्यारेलाल राजनांदगांव में सूती मिल मजदूरों से एक दिन रास्ते में मिले थे। शाम का समय था, मजदूर बहुत ही थके हुए दीख रहे थे। प्यारेलाल जी उनके साथ बातचीत करने लगे। उन्हें पता चला उनके शोषण के बारे में। 12 घंटे रोज मिल में मजदूरों को काम करना पड़ता था। इतना ही नही उनके साथ अधिकारी भी बहुत बुरी तरह पेश आते थे। उसी शाम ठाकुर प्यारेलाल ने ठान लिया कि वे मजदूरों को संगठित करेंगे और आन्दोलन करेंगे।

ठाकुर प्यारेलाल सिंह ने बचपन से ही एक प्रथम श्रेणी के खिलाड़ी होने के कारण जोश और उमंग के साथ हमेशा ज़िन्दगी जी। गिल्ली-डंडा, क्रिकेट, हाकी, शतरंज सभी खेलों में उनकी रुचि थी, और तैरना तो उन्हें इतना ज्यादा पसन्द था कि वे घंटों तैरते रहते थे।

ठाकुर प्यारेलाल सिंह का जन्म 21 दिसम्बर सन् 1891 को दैहान नाम के गांव में हुआ था। दैहान गांव राजनांदगांव तहसील में स्थित है। प्रारंभिक शिक्षा उनकी राजनांदगांव में हुई थी। हाईस्कूल के लिए उन्हें रायपुर आना पड़ा। सन् 1909 में उन्होंने मैट्रिक पास की। सन् 1913 में उन्होंने नागपुर से बी.ए. पास किया। सन् 1915 में उन्होंने वकालत पास की और उसी साल उन्होंने वकालत आरम्भ कर दी।

ठाकुर प्यारेलाल सोलह वर्ष की उम्र से ही स्वदेशी कपड़े पहनने लगे थे। उस वक्त वे कुछ क्रांतिकारियों से मिले थे जो बंगाल के थे। तबसे उन्होंने ठान लिया था कि देश सेवा ही उनके जीवन का मकसद होगा। सन् 1909 में जब प्यारेलाल सिर्फ उन्नीस साल के थे, उसी वक्त राजनांदगांव में सरस्वती वाचनालय की स्थापना की। वहां अखबार पढ़कर लोगों को देश की समस्याओं के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए उत्साहित किया जाता था।

सन् 1915 में प्यारेलालजी ने दुर्ग में वकालत आरम्भ की थी, पर सन् 1920 में जब नागपुर अधिवेशन में कांग्रेस ने असहयोग आन्दोलन छेड़ने की घोषणा की तो ठाकुर प्यारेलाल ने अपनी वकालत छोड़ दी और जिले भर में असहयोग आन्दोलन का प्रचार करने निकल पड़े।

असहयोग आन्दोलन के दौरान न जाने कितने विद्यार्थियों ने सरकारी स्कूल छोड़ दिये, कितने वकीलों ने वकालत छोड़ दी। ठाकुर प्यारेलाल जी के भाईयों ने भी स्कूल छोड़ दिया। उन स्कूल छोड़े हुए विद्यार्थियों के लिये ठाकुर प्यारेलाल सोचने लगे कि क्या किया जाये। बाद में उन विद्यार्थियों के लिए राष्ट्रीय स्कूलों की स्थापना की गई थी। प्यारेलाल जी ने खुद राजनांदगांव में एक माध्यामिक स्कूल की स्थापना की थी। धमतरी में राष्ट्रीय विद्यालय का दायित्व भी प्यारेलाल जी को सौंपा गया था। उनके पिता श्री दीनदयाल सिंह उन स्कूलों के डिपुटी इंस्पेक्टर थे जो राजनांदगांव, छुईखदान और कवर्धा रियासतों के थे।

ठाकुर प्यारेलाल वकालत छोड़ने के बाद गांव-गांव घूमकर चरखे और खादी का प्रचार करने लगे। प्रचार सिर्फ दूसरों के लिए नहीं था। प्रचार तोे अपने-आप के लिए भी था। ऐसा कहते हैं कि उन दिनों प्यारेलाल जी सिर्फ एक ही धोती पहनते थे। एक खादी की धोती। उसी को पहनकर स्नान करते, धोती का एक छोर पहने रहते, दूसरा छोर सुखाते, दूसरा छोर सूखाने पर उसे पहन लेते और पहला छोर सुखाते। तीन साल तक प्यारेलाल जी उसी धोती को पहनते रहे। ऐसे थे हमारे देश के लोग।

जब सन् 1923 में झंड़ा सत्याग्रह की घोषणा हुई तो दुर्ग में ठाकुर प्यारेलाल सत्याग्रहियों को संगठित करने लगे। कुछ ही समय के भीतर हजारों सत्याग्राही तैयार हो गये।

जब प्यारेलालजी गांव-गांव प्रचार कर रहे थे, उनकी माता की मृत्यु हो गई। ये खबर उन्हें छ: दिनों बाद मिली। घर लौटकर माता की क्रिया-कर्म समाप्त कर वे फिर से गांव-गांव घूमकर प्रचार करने लगे।

सन् 1924 में प्यारेलाल जी के नेतृत्व में मिल मजदूरों ने दूसरी बार राजनांदगांव में हड़ताल की। हड़ताली मजदूरों पर गोलियां भी चलीं। एक हड़ताली मजदूर शहीद हो गया और काफी मजदूर घायल हुए। जब ठाकुर प्यारेलाल वहाँ पहुँचे तो अधिकारियों ने उन्हें गिरफ्तार करने का साहस नहीं किया पर ठाकुर प्यारेलाल को राजनांदगांव छोड़ने के लिये मजबूर करने लगे। पर ठाकुर प्यारेलाल कुछ और दिन राजनांदगांव में ही रहे। मजदूरों की मांगें पूरी होने के बाद ही राजनांदगांव छोड़ी।

सन् 1924 में महात्मा गाँधी जी ने सत्याग्रह स्थगित कर दिया था। इसीलिये ठाकुर प्यारेलाल रायपुर में रहकर फिर से वकालत करने लगे। रायपुर और दुर्ग जिले, दोनों उनके कार्यक्षेत्र हो गये।

सन् 1930 में बहिष्कार आन्दोलन के संचालन का भार ठाकुर प्यारेलाल जी को कांग्रेस ने सौंपा। प्यारेलाल जी खुद शराब की दुकानों पर पिकेटिंग करते थे।

जब सन् 1930 में उन्होंने किसानों को संगठित किया तो उन्हें एक साल की कठिन कारावास की सजा दी गई। पुन: सन् 1932 में जब रायपुर में गाँधी चौक के सामने वे भाषण दे रहे थे तो उन्हें फिर से गिरफ्तार कर दो साल के लिये जेल में डाल दिया गया। सन् 1932 में ठाकुर प्यारेलाल की वकालत की सनद छीनी गयी और जब उन्होंने जुर्माना देने से इन्कार किया तो उनके घर का सामान कुर्क कर दिया गया।

सन् 1934 में जेल से छूटते ही उन्हें महाकोशल प्रांतीय कांग्रेस कमेटी का मंत्री चुन लिया गया। सन् 1936 में वे पहली बार असेम्बली के सदस्य चुने गये। गाँधी जी ने नई तालीम के बारे में विचार विमर्श के लिये उन्हें आमंत्रित किया था।

सन् 1936 में राजनांदगांव के मिल मजदूरों ने प्यारेलाल जी के नेतृत्व में फिर हड़ताल कर दी। इस बार अंग्रेज दीवान ने प्यारेलाल जी को राजनांदगांव की सीमा में प्रवेश निषेध का नोटिस दिया था। प्यारेलाल जी ने एक तरकीब निकाली। रेलवे प्लेटफार्म पर रहने लगे और नेतृत्व देते रहे। रेलवे प्लेटफार्म पर स्टेट का अधिकार नहीं था। अंग्रेज दीवान ने इसके बाद सरकार से लिखा-पढ़ी कर रेलवे प्लेटफार्म पर स्टेट का अधिकार करवाया। गाँधीजी ने इस हड़ताल में बहुत रुचि ली थी। बाद में राजनांदगांव मिल मजदूर आन्दोलन का नेतृत्व कामरेड रुईकरजी ने किया।

ठाकुर प्यारेलाल सिंह जी ने अकेले छत्तीसगढ़ में जितना कार्य किया, उतना कार्य बहुत संस्थाओं ने मिलकर भी नहीं किया। ऐसी थी उनकी कार्य-दक्षता।

सन् 1937 में ठाकुर प्यारेलाल का छत्तीसगढ़ कॉलेज की स्थापना में योगदान बहुत ही सराहनीय था। यह कॉलेज छत्तीसगढ़ में प्रथम कॉलेज था।

रायपुर नगर पालिका के ठाकुर प्यारेलाल लगातार तीन बार अध्यक्ष चुने गये। प्रथम बार सन् 1937 में, दूसरी बार सन् 1940 में और तीसरी बार सन् 1944 में। ठाकुर प्यारेलाल प्रचंड बहुमत से हर बार इसलिए चुने जाते थे क्योंकि उनके पास जनता का विश्वास, जनता का प्यार था। उस समय आज की तरह पैसा ही चुनाव लड़ने का साधन नहीं था। अध्यक्ष रहते हुए प्यारेलाल जी ने कई प्राइमरी स्कूल खोले, लड़कियों के लिये स्कूल खोले, दो नये अस्पताल खोले, सड़कों पर तारकोल बिछवाई, बहुत से कुंए खुदवाये।

सन् 1942 में प्यारेलाल जी के दोनों बेटे रामकृष्ण सिंह, सच्चिदानंद सिंह दो साल के लिए जेल गये। हरि ठाकुर, उनका छोटा पुत्र स्कूल छोड़कर गांव-गांव आन्दोलन का प्रचार कर रहा था।

सन् 1942 में एक घटना घटी थी जो ह्मदय को छू लेती है। पाँच क्रांतिकारी युवकों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया था। उनका अपराध था कि उन्होंने एक तहसीलदार साहब की हत्या की थी। युवकों को फांसी होने वाली थी। ठाकुर प्यारेलाल जी, तहसीलदार साहब, जो ईसाई थे, की पत्नी से मिले। उनकी पत्नी ने भारतीय सरकार को लिखा- "मेरे पति 1942 के आंदोलन में मारे गये, यही ईश्वर को मंजूर था, इन युवकों को फाँसी पर लटकाने से मेरी तरह इनकी पत्नियाँ विधवा हो जायेगी, जो मेरी बहनों के समान हैं और जो मेरे ही समान निर्दोष हैं। इसलिये इन युवकों को सरकार प्राण दान दे।" - हरि ठाकुर ""जल जगंल जमीन के संघर्ष की शुरुआत"", रुपान्तर लेखमाला-3

सन् 1945 में प्यारेलाल जी ने छत्तीसगढ़ बुनकर सहकारी संघ की नींव डाली और छत्तीसगढ़ के सभी जिले में बुनकरों की सहकारी संस्थाओं का निर्माण किया। इसके कारण अनगिनत बुनकर परिवार गरीबी से ऊपर उठे।

इसके बाद सन् 1944 में ठाकुर प्यारेलाल जी ने किसान सहकारी राईस मिल की महासमुंद में स्थापना में मदद की। इसके अलावा न जाने कितने संघों जैसे- धानी संघ, विश्वकर्मा संघ, ताम्रकार संघों का उन्होंने निर्माण किया।

सन् 1946 में ठाकुर प्यारेलाल जी ने छत्तीसगढ़ को सभी रियासतों में कांग्रेस की स्थापना की। सन् 1950 में वे आसाम गये वहां के छत्तीसगढियों की मदद करने के उद्देश्य से।

सन् 1950 में उन्होंने "राष्ट्र-बन्धु" (अर्ध-साप्ताहिक) का प्रकाशन आरंभ किया।

सन् 1951 को ठाकुर प्यारेलाल ने कांग्रेस से अपना त्याग पत्र दे दिया। अखिल भारतीय स्तर पर एक विशुद्ध गाँधीवादी संस्था के रुप में अखिल भारतीय किसान मज़दूर पार्टी के वे सदस्य थे। आचार्य कृपलानी इसके अध्यक्ष थे। बहुत कम समय के भीतर ही प्यारेलाल जी ने इतने अच्छे ढ़ंग से उस दल को संगठित किया कि सन् 51-52 के आम चुनाव (प्रथम) में इस दल को द्वितीय स्थान मिला। उसी पार्टी के टिकट पर प्यारेलाल जी सन् 1952 के आम चुनाव में रायपुर से फिर से विधान सभा (मध्य प्रदेश) के सदस्य चुने गये।

सन् 1950 में चुनाव के तुरन्त बाद ठाकुर जी आचार्य विनोबा के भूदान आन्दोलन में शामिल हो गये। न जाने कितने गांवों की उन्होंने पैदल यात्रा की। ऐसा कहते है कि मध्य प्रदेश का कोई हिस्सा नहीं छूटा। छत्तीसगढ़ के लोग उन्हें छत्तीसगढ़ का गाँधी कहने लगे थे। भूदान आन्दोलन में उन्होंने हजारों एकड़ भूमि एकत्र की और वितरण किया।

इन्हीं यात्राओं मेंे एक पदयात्रा ठाकुर प्यारेलाल सिंह की अंतिम यात्रा साबित हुई। जब सन् 1954 को ठाकुर जी मध्य प्रदेश की पदयात्रा के लिये निकले तो उनका उद्देश्य था- 2200 मील की पदयात्रा साढ़े तीन महीनों में खत्म कर तीन सौ गांवों में आन्दोलन का संदेश पहुँचाना। 15 दिनों तक बारिश में ही उन्होंने पदयात्रा की। चलते वक्त जब उन्हें ह्मदय शूल का पहला दौरा पड़ा, तो उन्होंने उसे "मस्कुलर पेन" कहकर टाल दिया और चलते चले गये। दो घंटे तक पैदल चलते रहे, लोगों से बातचीत करते हुए, उन्हें आश्वासन देते हुए।

उसके बाद पड़ाव पर पहुंचकर 2 घंटे कार्यकर्ताओं से चर्चा करके, सम्मेलन में पहुंचकर उन्होंने डेढ़ घंटे तक भाषण दिया।

यही भाषण उनका अंतिम भाषण था। रात 9 बजे जब वे बिस्तर पर लेटे, हृदय शूल का पुन: दौरा पड़ा। वे समझ गये कि उनके पास और समय नहीं है, और वे राम नाम करते-करते चले गये।

22 अक्टूबर, सन् 1954 को खारुन नदी के किनारे उनका दाह संस्कार हुआ। छत्तीसगढ़ के लोगों ने कहा कि छत्तीसगढ़ का गांधी चला गया।

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Content Prepared by Ms. Indira Mukherjee

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