छत्तीसगढ़

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रिखी क्षत्रिय और छत्तीसगढ़ के वाद्य

रिखी क्षत्रिय है लोक वाद्य संग्राहक। बहुत ही अच्छे कलाकार है रिखी क्षत्रिय जो छत्तीसगढ़ के है। उन्हें कई सम्मान मिल चुके हैं - श्रेष्ठ लोक कलाकार, श्रेष्ठ लोक साधक, छत्तीसगढ़ गौरव की उपाधि।

रिखी जी छत्तीसगढ़ में भिलाई में रहते हैं। स्टील प्लान्ट में काम करते हैं। सभी उन्हें लोक वाद्य संग्राहक के रुप में जानते हैं। पहले लोग उन पर हँसते थे। आज वही हँसने वाले उन्हें सम्मान देते हैं। रिखी क्षत्रिय न सिर्फ लोक वाद्य इकट्ठा करते हैं, बल्कि हर वाद्य को बजा सकते हैं, हर वाद्य के इतिहास के बारे में जानकारी रखते हैं।

रिखी क्षत्रिय का जन्म 7 मई, 1959 को हुआ। उन्होंने लोक संगीत में बी.ए. (आनर्स) की है। तबला में विद हैं। "लोक रागिनी" नाम के सांस्कृतिक संस्था के संस्थापक एवं प्रभारी हैं।

छत्तीसगढ़ में कई वाद्य लोक प्रचलित हैं और कई वाद्य दुर्लभ हैं। रिखी जी के संग्रहालय में हम सभी प्रकार के वाद्यों को देख व सुन सकते हैं।

रायपुर का दफड़ा और निसान, राजनांद गांव का रोंजो, दुर्ग क्षेत्र का डांहक, देन्तेबाड़ा का तुड़बुड़ी, कांकेर का हिरनांग, सरगुजा का सींगाबाजा, जशपुर का टमरिया, बिलासपुर का हिरकी, ढुंगरु, बस्तर का टामोक - ये सभी वाद्य और इसके अलावा और अनेक वाद्य रिखी जी के पास मौजुद हैं।

एक साक्षात्कार रिखी क्षत्रिय के साथ -

"मैं एक लोक कलाकार हूँ। कलाप्रेमी। और वाद्यों के ऊपर मैंने काम किया है। विगत पन्द्रह साल से लोक वाद्यों का संग्रह कर रहा हूँ। अभी मेरे पास 130 लोक वाद्य हैं। इसमें ऐसे ऐसे लोक वाद्य हैं जो सात आठ सौ साल पहले के हैं। मैंने बुजुर्गों को पूछा शादय उसके पहले के भी हों। लेकिन उनके बताने के हिसाब से सात आठ सौ साल पहले के हैं।

इसमें ऐसे ऐसे वाद्य हैं जिसको उसी क्षेत्र के लोग नहीं जानते, जिस क्षेत्र का वाद्य है। उनको मैनें संग्रह किया है। सिर्फ संग्रह ही नहीं किया, उनको बनाने की विधि, कैसे बजाते हैं - और उसके बाद एक नया रुप ये किया हूँ जो कभी बिल्कुल सार्वजनिक तौर पर बजे ही नहीं थे। संगीत में कभी बजे ही नहीं थे - उनको मैंने रिसर्च कर कर के जैसे मात्रा अलग अलग पड़ रहा है, उनको मैंने slow या fast ऐसे करके मैंने उनके सार्वजनिक रुप से एक कार्यक्रम तैयार किया है जिसको कहते हैं छत्तीसगढ़ के बाजा गाजा।

एक अपने तरफ से बाजा का अविष्कार किया है मैनें अभी - इसका नाम - धुंगड़ा - नाम दिया है। जो अभी तक बजे नहीं थे - इतने वाद्य मुझे मिल गए हैं - अलग अलग क्षेत्रों से अलग अलग उनका sound है। तो उनमें से मैंने एक तैयार किया। ये एकदम बिल्कुल हटके है - अभी तक क्या - दोनों तरफ से बजाते हैं - ढोल, जैसे देखे है, तो मैंने एक तरफ से किया और एक तरफ से हाथ को खोलना बन्द करना, खोलना, बन्द करना उससे आवाज़ फिर निकाला - उसका मैनें प्रयोग भी किया है। यहाँ दिल्ली में प्रगति मैदान में।

इन वाद्यों का संग्रह का मेरा मुख्य उद्देश्य है - मैं एक कलाकार हूँ। और कलाकार की पहचान वहाँ की संस्कृति और वहाँ की परम्परा से होती है। वहाँ की संस्कृति ही अगर नष्ट हो जाय तो वहाँ के कलाकार की क्या पहचान। ये मुझे दर्द है। मै दिल से पूजा किया है कला को। इसीलिये बहुत feeling होता था। इसीलिये research का एक कार्यक्रम किया। किसी से कोई सहयोग नहीं, जो मुझसे बचता है, खाने के बाद - उसी से मैनें तैयार किया।

ंगा।

अभी देखिये - हमारे यहाँ विवाह में पन्द्रह प्रकार के रसम होते हैं। आज के लोग - अगर पूछेंगे एक रसम के बारे में - क्योंकि वह वाद्य नहीं बजते - अगर वाद्य नहीं बजते तो उनको परम्परा के बारे में क्या मालूम - ये सब है - बहुत दुख होता है - हमारे यहाँ के सब पाश्चात्य संगीत के पीछे भाग रहे हैं लेकिन उनको ये नहीं मालूम कि हमारे वाद्य कई मीठे हैं, जो हमारे पूर्वजों ने तैयार किया है - यही हमारा जो धरोहर है, उसमें इतना मीठासपन है मधुर आवाज है। जितना भी हो सके मैं एक प्रयास कर रहा हूँ। मन में ठान लिया हूँ, इसमें जरुर सफल हो गाँव गाँव में प्रोग्राम करता रहता हूँ, लोग उनको अपना रहे हैं धीरे धीरे और वही अगर हो जायेगा तो मेरा उद्देश्य पूरा होगा, समझूंगा मैं।

मेरे संग्रह में जितने भी वाद्य हैं, किसी एक क्षेत्र का नहीं है। हमारे छत्तीसगढ़ में सोलह जिले हैं, ये सारे, सोलह जिले से संग्रह किया गया है। अलग-अलग जिलों में रहने वाले अलग अलग -- अदिवासी है और जनजाति है, ज्यादातर इन्हीं लोगों से मिला है वाद्य क्योंकि पहले तो यही लोग आये।

वाद्यों - ये एक माड़िया ढोल है। ढाई फिट लम्बाई का, डेढ फिट गोले का ढोल होता है - लकड़ी का इसका खोल होता है। और दोनों तरफ चमड़े से इनको मड़ा जाता है।

एक तरफ को गत कहते है और एक तरफ को तालि,। गत के तरफ एक साहि लगी होती है जिसके आवाज़ में गमक होती है। और ताली होता है जो कर्कश होती है। गले में लटकाकर हाथ से आघात करके बजाते हैं।

ये बस्तर जिले का है। बस्तर जिले में कोण्डा गाँव और जगदलपुर क्षेत्र में रहने वाले मुड़िया आदिवासी। उनका एक पर्व उत्सव होता है, ये राम नवमी के दिन प्रारम्भ होती है और हर गाँव में अलग-अलग एक महीने तक मनाते हैं। गाँव के बीच में सेमर का झाड़ होता है। ये वहाँ की धनजन की हानि न हो, लोग सुख सम्पत्ति से रहे, फसल अच्छे हो, बीमरी महामारी न हो इसकी रक्षा करने के लिये इसे देव का पूजा अर्चना एक महीना तक करते हैं। रात्रि में भोजन करके यहाँ पर जो नृत्य करते हैं, वे सिर्फ कुमारी या कुमारा होते हैं। एक दीपक जलाते हैं, और बजानेवाले बजाने लग जाते हैं और निकल पड़ते हैं वहाँ की युवक और युवतियाँ और रातभर गले से गले लगाकर, कमर पकड़कर झुमते हुये नाचते रहते हैं। उसमें इस वाद्य का प्रमुख स्थान है - माड़िया ढोल - मुड़िया ढोल है।

१) एक नम्बर है ठडका। सगुन के लकड़ी का खोल होता है। दो फीट लम्बाई के होते है और एक फिट मोटाई के (चौड़ाई) के। इनको कमड़ में बांधकर दो डन्डी से आघात कर बजाते हैं। अन्दर के तरफ खुला होता है। टकर टकर आवाज होती है।

२) ये मृदंग है। मृदंग बहुत से प्राचीन वाद्य है। इनको पहले मिट्टी से ही बनाया जाता था लेकिन

आजकल मिट्टी जल्दी फुट जने और जल्दी खराब होने के कारण लकड़ी का खोल बनाने लग गये है। इनको उपयोग, ये ढोलक ही जैसे होते है। बकरे के खाल से दोनों तरफ छाया जाता है इनको, दोनों तरफ स्याही लगाया जाता है। हाथ से आघात करके इनको भी बजाया जाता है।

हमारे छत्तीसगढ़ में नवरात्रि के समय देवी पूजा होती है, उसमें एक जस गीत गाये जाते हैं। उसमें इनका उपयोग होता है।

३) नगाड़ा - इसे नगाड़ा कहते है। नगाड़ा तो और भी देशों में होता है - लोकिन हमारे यहाँ नगाड़ा का उपयोग अलग ही तरीके से किया जाता है। होली का त्यौहार बड़ धूमधाम से मनाते है, रंग गुलाल खेलते हैं। ये नगाड़ा जोड़ो में होता है। डंडे से इस आधाम करके गाते है, फाग गीत गाते हैं। उसमें इनका उपयोग करते हैं।

४) चार नम्बर में है मुड़िय ढ़ोल

५) ये है हिरनांग - इसमें पन्द्रह घण्टी और बड़े बड़े धुधडु से, चमड़े का एक बेल्ट होता है, उसमें पिरोया जाता है। इनको कमड़ में बांधका और कमड़ हिलाकर बजाया जाता है।

गौड़ शिकार नृत्य होता है बस्तर क्षेत्र में बस्तर के दन्तेवाड़ा क्षेत्र में, वहाँ इनको दो लोक कलाकार कमड़ में बांधकर, कमड़ को हिला हिला कर इनका वादन करते हैं।

६) नम्बर में तिनकी कहते है। इनका तीन नाम है। अलग अलग क्षेत्रो में। बस्तर में इनको तुड़बुड़ी कहते हैं। दुर्ग और राजनानगांव जिले में डमरु कहते हैं। और कवधा जहाँ बैगा आदिवासी है, वे लोग इनको टिमकी कहते है। अलग अलग नाम और अलग अलग स्वरुप भी। कहीं छोटा, सकड़ा, मुँह के तरफ सकड़ा, कहो मुँह के तरफ बड़ा।

मिट्टी का खोल होता है और गाय बैल के चमड़े से इसको मड़ा जाता है। और कमड़ में लटकाकर, दो पतली डंडी से इसको आघात करके बजाते है।

इनका एक नृत्य होता है - तुड़बुड़ी नृत्य में, और सहयोगी वाद्य जैसे - जैसे शादी विवाह होता है - उससे जैसे सब्जी नमक, वैसे शादी विवाह के समूह वाद्यों में ये नमक का काम करता है।

दन्तेवाड़ा क्षेत्र में तुड़बुड़ी नृत्य माडिया आदिवासी करते हैं।

७) ये सातवां - घुंघरु है। छत्तीसगड़ में बिलासपुर जिला है। उस जिले में देवार आदिवासी है। उनका लोकवाद्य है घुंघरु। ये लोग घुमन्तु होते हैं। गांव गांव में घुम घुमकर गुमटी लगाकर रहते हैं - और नाच गान करके जीवन व्यापन करते हैं - उनका ये प्रमुख वाद्य है घुंघुरु।

ये लौकि, बांस, और बांस का टुकड़ा और तार से बजाते हैं - चमड़े का तार गाय और बैल के जो नस होते हैं, उनसे रस्सी तैयार किया गया है और उसी को आघात करके इसमें बजाया जाता है।

इनके साथ गीत भी गाते हैं। मधुर होता है इनका आवाज़।

८) ये चिकारा होता है। यह बहुत ही प्राचीन वाद्य है।

जिस समय हमारे छत्तीसगढ़ में हारमोनियम नहीं था, उस ज़माने का यह वाद्य है। उस समय बुजुर्ग लोग दिन भर मेहनत करने के बाद जब शाम को घर आते थे, चौपाल में बैठकर, और निकल पड़ते थे इनको लेकर, एक खजंरी वाद्य होता था - भजन गीत गाकर अपना थकान दूर करते थे।

तार वाद्य है ये। लकड़ी का खोल होता है - दो फीट का उसमें चमड़ा मड़ा जाता है। तार डालते है - और दो, हम इनका हथवा कहते हैं, घोड़े का पूंछ लगा रहता है - तारों को आघात करके बजाया जाता है।

९) नौ नम्बर है भेर - हमारे यहां छत्तीसगढ़ में रायगढ़ जिला है। वहाँ एक तहसी है सारंगगढ़। सारंगगढ़ क्षेत्र में भेर का उपयोग होता है - ये मांगलिक कार्य में, शादी विवाह में, पूजा-अर्चना हो रहा है, मेले में देव पूजा हो रहा है, उस समय उस स्थान को शुद्धिकरण के लिये ये प्रयोग करते हैं। बिगुल जैसे इनका आवाज़ होता है। और इनको मुँह से फुककर बजाते हैं। पाँच फिट की लम्बी पाइप जैसे, लोहे की चादर से बनी होती है। सामने के तरफ चोगा के जैसे होता है। इसको मुँह से फुककर बजाया जाता है।

१०) ये मादर है।

मादर को हमारे यहाँ वाद्यों का राजा कहते हैं। इसकी आवाज़ मैं एक ऐसी गमक होती है कि उस पर थाप पड़े तो जो नर्तक है, उसके पैरो में थिड़कन पैदा हो जाती है -

ये मिट्टी का एक खोल होता है, तीन फिट लम्बाई का और एक तरफ गद कहते हैं, एक तरफ तालि कहते हैं, एक तरफ दस इंच का रहता है, और एक तरफ से छे इन्च का। इसको चमड़े से दोनों तरफ मड़ा जाता है। और चमड़े के ही रस्सी से इनको खीचा जाता है। इस तरह यह तैयार होता है। लटकाने के लिए एक रस्सी होती है गले में। गले में लटकाकर और दोनों हाथ से आघात करके इसको बजाते हैं - इनकी आवाज़ बहुत ही मीठी और मधुर होती है। इनको लगभग छत्तीसगढ़ के सभी क्षेत्रों में बजाते हैं। करमा नृत्य में इसे मुख्य रुप से उपयोग करते हैं।

काकसार नृत्य होता है नरापनपुर क्षेत्र में - मुड़िया आदिवासी करते हैं। उनमें प्रमुख उपयोग होता है। उनको बजाये हुये निकलते हैं कलाकार दन्तेबाड़ा क्षेत्र में माड़िया आदिवासी निवास करते हैं। उनका एक गौड़ शिकार नृत्य होता है, उनमें इनका उपयोग करते हैं। पहले क्या होता था, आज से दो सौ साल पहले, संगीत लिपिबद्ध नहीं था, उस समय लोग अपने मन से गाते थे, आगे पीछे होते थे उस समय लगाया अपनी बुद्धि और इसका आविष्कार हुआ, और उन्होंने कहा पहले इसका वादन होगा और इसी के लय में सारे नाचने वाले, बजाने वाले, गाने वाले इसी रीदम में चलेंगे। इस तरह पूरे संगीत को सूत्रबद्ध किया। ये वही वाद्य है। ठडका -

रिखी क्षत्रीय के पास जो खोजे गए लोक वाद्य है, उनमें से कुछ वाद्यों का नाम निम्नलिखित है -

ंहर

मांदर, खंजेरी, मांदरी, ढोलक, टिमकी, दफड़ा, गुदुम, नंगाड़ा, डमरु, डफ (चांक), मृदंग, डांहक, माडिया डोल, बैगा मांदर, सरहुल मांदर, गोडी कर्मा मांदर, जसगीत मांदर, अखाड़ा ढोल, टामोक, मिरदिन, नंगाड़ा, मरनी ढोल, हुलकी, थाली, झांझ, मंजीरा, झुमका, करताल, ठिसकी, झुनझुना, ठडका, खड़ताल, मैनाही बांसुरी, गेंडी बांसुरी, चटकोला, धनकुल, हिटकी, छर्रा, फटकक्का, धुनधुना, टूड, पैजना, चमीटा, धीनी, चटका, रामधुनी, चटका (रैला नृत्य) डंडा, रोजो, खनखना, डेंडोर, घंटी, धांधरा, इत्तापुल्ला (पैंडी) मूसल, झालर, शंख,
बांसुरी, राउस बांसुरी, जराड, अलगोजा, नकडेवन (बीन), मोदरी, बांस बाजा, तुरही, तुनरु, बिगुल, सगिया फोन, तंबूरा, एकतारा, चिकारा, भेर, झल्लर लौडी, र्रूंजू (सरांगी) गतका, रइचुली, भन्नाटी, तुड़बुड़ी नृत्य ढोल, दुगरु, व्याकुल तरंग, हिरनांग, धुमरा, हुलकी, मुरचंम, छड़ी झुनकी, कुहकी, टमरिया, नुनू बाजा, ताउस, गतका, धसिया ढोल, कोन्डोडका, आंगादेव ढोल, झालर, खनखना, ढोक, खनी, म एवं तुर्रा।

रिखी क्षत्रिय और उनके साथी

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Content Prepared by Ms. Indira Mukherjee 

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