देवनारायण फड़ परम्परा  Devnarayan Phad Tradition

बगड़ावतों और रावजी का युद्ध

युद्ध क्षेत्र में नीयाजी


इधर युद्धभूमि से वापिस आकर नेतुजी नियाजी को जगाती है और कहती है कि उठिए, आप के दोनों बेटे घमासान युद्ध में मारे गए हैं।

जब नियाजी उठते हैं तो देखते हैं कि उनके महल की छत पर बहुत सारी गिरजें (चीलें) बैठी हुई हैं। नियाजी गिरजों से पूछते हैं कि कहो आपका यहाँ कैसे आना हुआ।

गिरजें कहतीं हैं कि हमें रावजी और बगड़ावतों के युद्ध की खबर सात समुन्दर पार से लगी है। कलयुग के इस महाभारत में हम अपनी भूख मिटाने आई हैं। अगर आप हमारी भूख मिटाने का वचन दो तो हम यहाँ रुकें नहीं तो वापस जाएं।

नियाजी जवाब देते हैं कि इस युद्ध में मैं बहुत लोगों के सिर काटूगां। तुम पेट भर कर खाना। और अगर तुम मेरी बोटियाँ खाना चाहती हो तो ६ महीनें बाद आना। मैं ६ महीने का भारत करुँगा (नियाजी को ६ महीने आगे तक का पहले से ही आभास हो जाता था)

नियाजी युद्ध में जाने से पहले भगवान से प्रार्थना करते हैं कि मैं महल में बहुत आराम से रहा और अगले जन्म भी मुझे इसी देश में ही भेजना और भाई भी सवाई भोज जैसा ही देना। फिर नेतुजी नियाजी की आरती उतारती है और युद्ध में जाने के लिए उनके तिलक करती हैं।

नेतुजी फिर नियाजी को सवाई भोज से मिलने जाने के लिए कहती है। नियाजी, नेतुजी कि बात मानकर सवाई भोज से मिलने जाते हैं।

जब दोनों भाई गले मिलते हैं तब दोनों की आँखों में आँसू आ जाते हैं कि अबके बिछ्ड़े जाने कब मिलेगें। नियाजी कहते हैं कि अब हमारा मिलना नहीं होगा।

नियाजी फिर रानी जयमती से भी मिलते हैं और एक वर मांगते हैं कि हमारे मरने के बाद हमारा नाम लेने वाला कौन होगा? भवानी कहती है कि बहरावत का बेटा भूणा जी और सवाई भोज के वारिस मेहन्दूजी पानी देने के लिए रहेंगे। इन दोनों को तुम राज्य से दूर भेज दो, तो ये बच जाऐंगे। और तुम बगड़ावतों का नाम लेने वाला छोछू भाट रहेगा। और तुम्हारे यहाँ भगवान स्वयं अवतार लेंगे। इतना सुन नियाजी सवाई भोज के पास वापस आ जाते हैं।

और उनके महल में अपनी बड़ी भाभी (सवाई भोज की पहली रानी पदमा दे) को बुलवाकर मेहन्दूजी को ले जाने का आग्रह करते हैं।

पदमा दे बड़े भारी मन से अपने बेटे को नियाजी के साथ विदा करती है और यह तय होता है कि वो बगड़वतों के धर्म भाई भैरुन्दा के ठाकुर के पास अजमेर में रहेगा।  

सवाई भोज उस समय मेहन्दू के साथ कुछ सेवक और घोड़े और उनके खर्चे के लिये काफी सारी सोने की मोहरें एवं काफी सारी धन-दौलत भी भेजते हैं। सवाई भोज कहते हैं बेटा मेहन्दू कई वर्ष पहले एक बिजौरी कांजरी नटनी अपने यहां कर्तब दिखाने आयी थी तब उसे हमने ढ़ाई करोड़ का जेवर दान में दिया था। उसमें से आधा तो वो अपने साथ ले गयी और आधा (सवा करोड़ का) जेवर यहीं छोड़ गयी थी वो मेरे पास रखा है। मेरे मरने के बाद अगर वो आ जाये तो तुम ये जेवर उसे दे देना और उसके नाम का यह खत भी उसे दे देना। जेवर को एक रुमाल की पोटली में बांध कर दे देते हैं और कहते हैं कि अगर वो नहीं आये तो यह धन अपने पास मत रखना इसे कोई भी जनसेवा के काम में लगा देना। कुंआ, तालाब, बावड़ी बनवा देना। इतना कहकर सवाई भोज नियाजी और मेहंदूजी को भारी मन से भेरुन्दा ठाकुर के पास भेजने के लिए विदा करते हैं। और संदेश देते हैं कि जब कभी भी बिजौरी कांजरी आए, यह जेवर उसे मेहन्दू के हाथ से दिला देना।

सवाई भोज मेहन्दु जी के अलावा बगड़ावतों के ४ और बच्चे नियाजी को दे देते हैं और कहते हैं कि इन सबको भेरुन्दा ठाकुर के पास पहुँचा देना

रानी जयमती को इस बारे में पता चलता है तो वो हीरा को कहती है कि नियाजी चोरी करके ४ बच्चों को ले गए हैं लेकिन मैं किसी को नहीं छोडूगी और वह अपना चक्र चला कर मेहन्दूजी के अलावा बाकी सब बच्चों के शीश काट लेती है। मेहन्दू जी भेरुनादा ठाकुर के पास अजमेर चले जाते हैं।

यहां से फिर नियाजी अपनी रानी नेतुजी को साथ लेकर बाबा रुपनाथजी के पास गुरु महाराज के दर्शन के लिये रुपायली जाते हैं। और उनके पांव छूकर कहते हैं कि गुरुजी आज्ञा दो तो युद्ध शुरु करे, बाबा आशिष देवो।

नियाजी बाबा रुपनाथजी की परिक्रमा लगा कर कहते हैं मेरे जैसे चेले तो आपको बहुत मिल जायेगें, मगर मुझे आप जैसा गुरु फिर नहीं मिलेगा।

बाबा रुपनाथजी कहते हैं, बच्चा यह क्या कहते हो, मेरे जैसे तो बाबा बहुत मिल जायेगें मगर तेरे जैसा चेला नहीं मिलेगा।

नियाजी कहते हैं कि जब मैं अगला जन्म लूं तो मुझे शेर का जन्म देना ताकि मेरे मरने के बाद आपके बिछाने के लिए मेरी खाल काम आ जाए।

नेतुजी बाबा रुपनाथ से कहती है कि मेरे पति को अगले जन्म में अगर शेर का जन्म मिले तो मुझे शेरनी का जन्म देना ताकि मैं उनके साथ वन में रह कर उनके दर्शन करती रहूँ। बाबा रुपनाथ फिर नेतुजी से कहते हैं कि अगर नियाजी का शीश भवानी ले जाए तो तू इसका खाण्डा अपने साथ ले जाना और इसके खाण्डे के साथ ही सती हो जाना। बाबा रुपनाथ यह वचन नेतुजी से ले लेते हैं।

बाबा रुपनाथ जी नियाजी को अपनी कुटिया के अन्दर ले जाते हैं। उन्हें एक जड़ी-बूटी देते हैं और कहते हैं कि इसे अपने साथ युद्ध-भूमि पर ले जाओ।

नियाजी को जड़ी देकर बाबा रुपनाथ कहते हैं कि यह ऐसी जड़ी है जिसके असर से सिर कटने के बाद भी तुम ८० पहर तक दुश्मन से लड़ सकते हो। तुम इसे अपनी जांघ पर बांध लो लेकिन इसकी खबर किसी को भी मत देना।

बाबा रुपनाथजी निया से कहते हैं कि निया सब पहर का युद्ध करने के बाद सीधा तू मेरे पास आना। नियाजी कहते है बाबा गुरुजी मैदान से दिन भर की लड़ाई के बाद ंगा। ७ कोस चलकर आप के पास आना तो मुमकिन नहीं है। बाबा रुपनाथजी कहते है कि तेरी बात सही है, मैं ही तेरे साथ चलता हूं और नेगदिया में ही धूणी रमा

बाबा रुपनाथ और नियाजी साथ-साथ नेगदिया आ जाते हैं। बाबा रुपनाथ नेगदिया गांव के बाहर ही अपनी धूणी लगा लेते हैं। शंकर भगवान के अवतार बाबा रुपनाथ जी नियाजी को आशीर्वाद देकर युद्ध के लिये विदा करते हैं। और जब तक नियाजी युद्ध करते हैं तब तक नेगदिया छोड़ कर नहीं जाते हैं।

हर सुबह सूरज उगने के साथ नियाजी रण का डंका बजा कर रावजी की सेना पर टूट पड़ते और कई सैनिको और सामंतो को मार डालते। रावजी के खास निजाम ताजूखां पठान, और अजमल खां पठान की १२ हजार सेना का सफाया कर नियाजी उनके सिर काट देते हैं।

हर शाम नियाजी युद्ध भूमि से वापस लौटते समय अपने गुरु बाबा रुपनाथ जी की धूणी पर आते हैं। बाबा रुपनाथजी अपने हाथ का कड़ा नियाजी की देह पर घुमाते हैं और धूणी की राख लगाकर, अपने कमण्डल में से पानी के छीटें देते है जिससे नियांजी के सारे घाव भर जाते हैं और शरीर पर कहीं भी तलवार या भाले की चोट के निशान नहीं रहते हैं। बाबा रुपनाथ कहते हैं कि ये बात किसी को मत बताना, किसी को भी इसका जिक्र मत करना। अब बावड़ी पर स्नान कर शिवजी का ध्यान करके घर जाओ।

नियाजी बावड़ी पर स्नान करते हैं, शिवजी का ध्यान कर रंग महल में आते हैं। नेतुजी उन्हें भोजन करवाती है, पंखा झलती है। नियाजी अगली सुबह वापस रण क्षेत्र में आ जाते हैं और युद्ध में मालवा के राजा को मार गिराते हैं। मन्दसोर के मियां मोहम्मद की फौजो का सफाया कर देते हैं। मियां का सिर काट देते हैं और वापस बाबा रुपनाथजी के पास आते हैं। और फिर बाबा रुपनाथजी नियाजी के ऊपर अपना लोहे का कड़ा घुमाते हैं, धूणी की राख लगाते हैं, पानी के छीटें देते हैं। नियाजी के सारे घाव फिर से भर जाते हैं। ये क्रम कई दिनों तक चलता रहता हैं।

रण क्षेत्र में तेजाजी

उधर तेजाजी बगड़ावतों के बड़े भाई युद्ध क्षेत्र में आते हैं। जब नियाजी से युद्ध करके जाने के बाद रावजी की सेना खाना बना रही होती है, रावजी के सैनिक बाट्यो सेक रहे होते हैं। तब तेजाजी अपनी सेना के साथ युद्ध क्षेत्र में आते है उनकी बाट्या वगैरा सब बिखेर देते हैं और सेना में भगदड़ मचा कर वापस चले जाते हैं। दोनों भाईयों का ये क्रम ३-४ दिनों तक चलता रहता है।

 

 
 

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