देवनारायण फड़ परम्परा  Devnarayan Phad Tradition

खैड़ा चौसला में भूणाजी की वापसी

छोछु भाट भूणाजी की तलाश में राण शहर में  Download and View Animation


अब देवनारायण भाट जी से कहते हैं बाबा भाटजी मेहन्दू जी आ गये, मदनाजी आ गये, भांगीजी आ गये अब बाकि बचे भूणाजी। अब उनको लाने की तैयारी करो। और कल सुबह ही रवाना हो जाओ। ंM* भाट देवनारायण से कहता है कि सरकार वहां दरबार में कोई मुझे पहचान लेगा तो मुझे मार डालेगा, मैं तो नहीं जा तो देवनारायण भाट की काया ही बदल देते हैं और उसे २५ साल का जवान बना देते हैं। और कहते हैं कि यदि तुझे जन्म देने वाली तेरी मां तुझे पहचान जायेगी तो वहां भी तुझे कोई पहचान लेगा और यदि तेरी मां तुझे नहीं पहचान सकी तो तुझे वहां भी कोई नहीं पहचान सकता।

भाट सबसे पहले अपनी मां के पास जाता है। वो उसे नहीं पहचाती है, तो भाट को विश्वास हो जाता है कि अब मुझे डर नहीं है।

छोछू भाट माता साडू के पास आता है और जाने की इजाजत लेता है। सा माता छोछूभाट को भूणाजी को देने के लिए संदेश लिखकर देती है। देवनारायण और मेहन्दू जी भी अपनी ओर से अलग-अलग पत्र लिखकर देते हैं। माता साडू पातु कलाली के नाम भी पत्र लिखकर देती है क्योंकि पातु कलाली को सवाई भोज ने बहन बनाया था। लिखती है ननद बाईसा भाट जी को भूणा जी से मिलवा देना। भाट जी को जाते समय देवनारायण कहते है जब भी तेरे पर विपदा आये तू मुझे याद कर लेना मैं तेरी मदद कर दूंगा।

अब छोछू भाट गोठां से राण के रास्ते चल पड़ता है। छोछू भाट २५ साल का जवान लगता है। कोई उसे पहचान भी नहीं सकता है। छोछू भाट राण में आते समय रास्ते में आम्बासर की बावड़ी पर आकर रुकते है। बावड़ी पर बैठ जाते हैं और वहीं अपनी वीणा से सुर निकालने लगते हैं। वीणा की आवाज सुनकर वहां पानी भरने आने वाली पनीहारिने मुग्ध हो जाती है। वहां आने वाली नेनोली कुम्हारी की दासियां सवाई भोज के गीत गाते हुए भाट को पहचान लेती हैं। उन्हें पता चल जाता है कि ये तो बगड़ावतों का भाट है। नेनोली कुम्हारी की दासियां जाकर बताती है कि बाईसा आज तो बगड़ावतों का भाट आया हुआ है और वो सीधा यहीं आ रहा है।

भाट सबसे पहले राण में आते ही नेनोली कुम्हारी के यहां आता है। नेनोली कुम्हारी परदेसियों के रात को ठहरने व खाने-पीने की व्यवस्था भी करती थी।। नेनोली उसे वहां ठहराने के लिये मना कर देती है और कहती है कि वो तो बगड़ावतों को जानती ही नहीं है और भाट को वहां से भगा देती है, और अपना दरवाजा बन्द कर लेती है। और भाट के पीछे अपनी दासियों को भेजकर कहती है कि भाट का ध्यान रखना ये कहां जाता है और क्या करता है, यह सब देखना ?

वहां से भाट पातु कलाली से मिलने जाता है। पातु कलाली के महल के बाहर आकर भाट अपनी मोहिनी वीणा बजाने बैठ जाता है। पातु सोचती है बगड़वतों को तो मरे ११ वर्ष हो गये है लेकिन ये ते छोछू भाट की मोहनी वीणा की ही आवाज है। पातु भाट जी को अपने महलों में बुलवाती है। भाट पातु को आकर नमस्कार करता है और माता साडू का लिखा पत्र देता है। पातु पत्र पढ़कर खुश होती है। और भाट को भूणा जी से मिलाने से पहले उन्हें भोजन करने का आग्रह करती है और कहती है कि खाण्डेराव (भूणाजी) तो शिकार करने गये हुए हैं, शाम तक आयेगें। तब तक खाना खाकर आराम करो। शाम को उठकर उड़दू के बाजार में जाकर उनसे मिल लेना।

भाटजी खाना खाकर सो जाते हैं। शाम को पातु भाट जी को उठाती है। भाटजी हाथ मुंह धोकर तैयार हो जाते हैं और पातु से पूछते हैं कि मैं भूणाजी को कैसे पहचानूंगा, कोई निशानी हो तो बताओ।

पातु बताती है कि बोर घोड़ी पर बैठकर सैर-सपाटा करने जाते है। शक्ल हू-बहू बाहरावत जैसी है और चाल भी अपने बाप जैसी ही है और देखने में सबसे अलग दिखते हैं।

भाट उड़दू के बाजार में आकर आसपास की सारी धूल-रेत इकट्ठी कर अपने पास ढेरी लगा लेते हैं और अपनी ढाल से धूल उफणने लग जाते हैं। सारे बाजार में धूल ही धूल उड़ने लगती है।

सबसे पहले नीम देवजी की सवारी आती है और नीम देवजी देखते हैं कि एक आदमी अच्छे सफेद कपड़े पहने धूल को अपनी ढाल में लेकर डोल रहा है। नीम देवजी आकर उससे पूछते है कि भाई धूलिया, तू कौन है, और क्या कर रहा है ?

भाट जवाब देता है महाराज परदेशी हूं। खर्चा पानी के पैसे खतम हो गये, अमल पानी के पैसे भी नहीं है। मुझे पता चला की ११ साल पहले बगड़ावत अपने घोड़ो के गले में कच्चे धागे में सोने की मोहरे पिरो कर बाजार से निकलते थे। कहते हैं कि जब उनके घोड़े दौड़ते थे तो कुछ मोहरें रास्ते में गिर जाती थी, वो शायद इस धूल में मिल जाये तो खर्चा पानी का जुगाड़ हो जाये।

नीम देवजी भाट की बात सुनकर बिगड़ जाते हैं कहते हैं बगड़वतों को मरे ११ बरस हो गये हैं। अब तुझे मोहरें कहां से मिलेगी। भाट कहता है सरकार धूल में मोहरें मिल जायेगी। नीम देवजी कहते है कि मोहरें नहीं मिली तो मैं तेरे को यही मार डालूंगा।

भाट ने सोचा कि कह तो दिया अब तो देव महाराज ही रक्षा करेगें। देवनारायण का नाम लेकर ढाल में धूल भरकर धीरे-धीरे नीचे गिराने लगा। देवनारायण समझ जाते हैं कि भाट याद कर रहा है। वो भाट की ढाल में पांच मोहरें भैरुजी के हांथों रखवा देते हैं।

भाट की ढाल में से धूल के साथ-साथ मोह गिरती है। भाट मोहरे देखकर नीम देवजी से कहता है ये देखो। नीम देवजी मोहरों को देखकर भाट से कहते है कि तेरा अमल पानी आज मेरी ओर से है, बोल कितनी खायेगा ? भाट कहता है, आप क्या कराओगे मेरा अमल पानी ? नीम देवजी कहते है बोल तो सही, अभी व्यवस्था करवाता हूं। भाट बताता है, सवा मण अमल अढाई मण भांग और अढाई मण मुगंड़ा और सवामण मावा कर्रूं हूं। नीम देवजी कहते हैं कि भाट इतनी अमल खाकर कहीं मर गया तो। भाट कहता है महाराज ये तो मेरा एक वक्त का अमल है। इतनी तो मैं सुबह शाम रोज खाता हूं। नीम देवजी भाट के कहे अनुसार सारा सामान मंगवाते हैं और ढेर लगा देते हैं।

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और भाट से कहते हैं देख भाट अगर तू ये सब नही खा सका तो तुझे यहीं, इसी समय जमीन में गड़वा दूंगा। भाट कहता है सरकार खुले में तो मैं नहीं खा इतने सारे लोग देख रहे हैं। मेरे को न लग जाये कहीं और मैं मर्रूं जा पर्दा कराओ पहले।

नीमदेवजी भाट के चारों तरफ कनात लगवा देते है। भाट अन्दर बैठकर भगवान देवनारायण को याद करता है। देवनारायण अपने ६४ जोगणियों और ५२ भैरुओं को भाट की रक्षा के लिये भेजते हैं। भाट देखकर कहता है तुम सब आ गये हो तो ये सब अमल भांग भूंगड़ा चट कर जाओ।

जोगणियां और भैरु सारी अमल और भांग भूंगड़ा सब साफ कर जाते हैं और फिर गायब हो जाते हैं। थोड़ी देर बाद भाट कनात फाड़कर बाहर निकलता है और जोर की उबासी लेता है और कहता है महाराज अभी थोड़ी सी कसर रह गयी है।

नीम देवजी कनात हटवाकर देखते हैं कि भाट तो सब माल साफ कर गया है और साथ घर चलने के लिये कह रहा है कि बाकि कसर आपके घर में जाकर पूरी कर्रूंगा। यह सोचकर कि यह तो पीछे पड़ जाएगा, नीम देवजी वहां से जल्दी से रवाना हो जाते हैं।

नीम देवजी की सवारी जाने के बाद भूणाजी की सवारी आ जाती है।

भाट वापस धूल लेकर डोलने लग जाता है। खाण्डेराव धूलीया देखकर सवाल करते हैं कि भाई ये क्या कर रहा है, इस धूल में तू क्या ढूंढ रहा है, क्या खो गया है तेरा ?

भाट कहता है सरकार मेरे २४ लाल और १ हीरा खो गया है, उसे ढूंढ रहा हूं।

भूणाजी कहते हैं कि धूल में हीरा कहीं मिलता है क्या ? और सोचते है कि इसका कोई टाबर (बालक) खो गया है जिसे ये हीरा कह रहा है। भूणाजी के साथ दियाजी और कालूमीर पठान होते है वो उन्हें समझाते हैं कि ये बगड़ावतों का भाट है, आप कहां इससे बातें कर रहे हो, आप तो चले यहां से।

भूणाजी कहते है कि ये बातें अच्छी कर रहा है और फिर भाट से बातों में लग जाते हैं। भाट जब सारी बात साफ-साफ कहता है कि ये जो आप के साथ राव उमराव है इन्होंने रण में आपके बाप, काका, दादा को मरवा दिया। इतनी बात सुनते ही राव उमराव सब भाग कर रावजी के पास आकर कहते हैं कि भूणाजी को बगड़ावतों के भाट ने बाजार में रोक लिया है और पोथी पत्री सुना रहा है। अब कुंवर खाण्डेराव अपने नहीं रहे, दुश्मनों के हो गये हैं। रावजी भाट को मरवाने के लिये अपने हाथी को दारु पिलाकर छोड़ देते हैं।

इधर भूणाजी को जब विस्तार से सारी बात पता चल जाता है कि मेरे बाबा बहरावत जी और काका सवाई भोज को रावजी ने मरवाया है तो वो भाट से और भी वार्तालाप करते हैं। थोड़ी देर में रावजी का हाथी बाजार में आता है और भाट को मारने की कोशिश करता है। वहां भूणाजी अपनी तलवार से हाथी की गर्दन काट देते हैं और भाट की रक्षा करते हैं। रावजी को पता चलता है कि हाथी मारा गया है। अगर भूणाजी गुस्से में यहां आ गये तो सब सफाया कर देगें।

इसलिए भूणाजी को वहीं से पुष्कर जाने का आदेश करा देते है। भूणाजी भाट से कहते है, भाटजी चलो पुष्कर मेला देखने चलते हैं, बाकि बात वहीं करेगें।

पुष्कर मेले में जाने से पहले भाट भूणाजी को अपने साथ लेकर पातु कलाली के यहां आता है और देवनारायण का पत्र, मेदू जी का पत्र और साड माता का पत्र देता हैं। पत्र पढ़कर भूणाजी की आंखों में आंसू आ जाते हैं। और पातु कलाली भी भूणाजी को बगड़ावतों की सारी बात बताती है।

 

 
 

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