काशी / वाराणसी के तीर्थ स्थल

 


सुनील कुमार झा

 

देवनगरी काशी धर्म एवं विद्या की पवित्र तथा प्राचीनतम् नगरी मे विख्यात है। जहाँ वैदिक साहित्य की संहिताओं ब्राह्मण ग्रन्थों एवं उपनिष्दों में काशी का उल्लेख है, वहाँ पाणिमि, पंतञ्जलि आदि ग्रन्थों में भी काशी की चर्चा है। पुराणों मे स्पष्ट है कि काशी क्षेत्र में पग-पग पर तीर्थ है। यहाँ एक तिल भी स्थान ऐसा नहीं है, जहाँ महादेव जी का लिङ्ग न हो। स्कन्दपुराण काशी-खण्ड के केवल दशवें अध्याय में चौसठ शिवलिङ्गो का उल्लेख है। हेन सांग ने उल्लेख किया है- कि उसके समय में वाराणसी में लगभग १००(सौ) मंदिर थे। उनमें से एक भी सौ फीट से कम ऊँचा नहीं था। विश्वनाथ की नगरी में तीर्थ स्थानों की कमी नहीं हैं, किन्तु मत्स्यपुराण के अनुसार पाँच तीर्थ प्रमुख (१) दशाखमेध, (२) लोलार्क कुण्ड, (३) केशव (आदि केशव), (४) बिन्दु माधव, (५) मणिकर्णिका ।
सन् ११९४ ई. में कुतुबद्दीन एबक ने काशी के एक सहस्र मंदिरों को तोड़-फोड़कर नष्ट कर दिया।

१. अलाउद्दीन खिलजी ने भी लगभग एक हजार मंदिरों को नष्ट कर धराशायी कर दिया।

२. इस तोड़ फोड़ में विश्वनाथजी का मंदिर भी था, किन्तु सन् १५८५ ई. में सम्राट अकबर के राजस्व मन्त्री की सहायता से श्री नारायण भ ने विश्वनाथ जी के मंदिर को पुनः बनवाया सम्राट औरंगजेब ने काशी काशी के प्राचीन मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनवायी जो आज भी है। यही नहीं उसने हजारों मंदिरों को नष्ट कर दिया, जिसके कारण उस काल में बीस मंदिरों को भी गिन पाना कठिन हो गया था।

३. इस काल के पश्चात् मराठा राजाओं तथा सरदारों ने अनेक मंदिर बनवाए। अंग्रेजों के शासन काल में बहुत से मंदिरों का निर्माण हुआ। सन् १८२८ ई. में प्रिन्सेप ने गणना करायी थी जिससे पता चला था कि काशी में एक हजार मंदिर विद्यमान थे। शेकिंरग ने लिखा है कि उसके समय में चौदह सौ पंचावन मंदिर थे। हैवेल का कथन है कि उसकी गणना के अनुसार उस समय लगभग ३५०० मंदिर थे।

वाराणसी के देवता विश्वनाथ के जिस मंदिर को औरंगजेब ने नष्ट किया था समीप ही १८वीं शताब्दी के अन्तिम चरण में महारानी अहल्या बाई होलकर ने वर्तमान विश्वनाथ मंदिर का निर्माण करवाया था। त्रिस्थली सेतु के अनुसार पापी मनुष्य भी विश्वेश्वर के लिंग का स्पर्श कर पूजा कर सकता था। आधुनिक काल में प्रमुख तीर्थ स्थल है- (१) अस्सि और गंगा का संगम, (२) दशाश्वमेघ घाट, (३) मणिकर्णिका, (४) पंचगंगाघाट, (५) वरुणा तथा गंगा का संगम, (६) लोलार्क तीर्थ।

दशाश्वमेघ शताब्दियों से विख्यात है। डा. काशी प्रसाद जायसवाल के अनुसार भार शिव राजाओं ने दस अश्वमेघ यज्ञों के अनुष्ठान कर यहाँ अभिषेक किया था।

४. मणिकर्णिका को मुक्ति क्षेत्र भी कहा जाता है। पंचगंगा में पाँच नदियों के धाराओं के मिलने की कल्पना की गई है।

५. नारदीय पुराण तथा काशी-खण्ड में कहा गया है कि जो मनुष्य पंचगंगा में स्नान करता है वह पंच तत्वों में स्थित इस शरीर को पुनः धारण नही करता, मुक्त हो जाता है। वरुणा-गंगा का संगम तीर्थ आदि केशव घाट बहुत ही प्रचीन है। कन्नौज के गहड़वाल राजाओं ने जो विष्णु के भक्त थे, जब काशी को अपनी राजधानी बनायी तो इस भाग को और अधिक महत्व प्राप्त हुआ। 

वाराणसी में बहुत से उपतीर्थ हैं। काशी खण्ड में ज्ञानवापी का उल्लेख मिलता है जो स्वयं में एक पवित्र स्थल है। विश्वनाथ मंदिर से दो मील की दूरी पर भैरोनाथ का मंदिर है, उन्हें काशी का कोतवाल कहा जाता है। उनके हाथ में बड़ी एवं मोटे पत्थर की लाठी होने के कारण इन्हें दण्डपाणि भी कहा जाता है। इसका वाहन कुत्ता है। काशी खण्ड में छप्पन विनायक (गणेश) मंदिर वर्णित है। ढुण्ढि़राज गणेश एवं बड़ गणेश में ही है। काशी के चोदह महालिंग प्रसिद्ध है। पुराणों में काशी के तीर्थों एवं उपतीर्थों का वर्णन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता है। लगभग एक सौ पच्चीस तीर्थों का वर्णन काशी खण्ड में मिलता है।

६. काशी की पंचक्रोशी का विस्तार पचास मील में है

७. इस मार्ग पर सैकड़ों तीर्थ है। तात्पर्य यह है कि काशी में तीर्थों की संख्या अगणित है।
काशी केवल हिन्दू-धर्म के आस्थावानों का ही तीर्थस्थल नहीं है। जैन तीर्थकर पार्श्वनाथ जी ने ७७७ ई. पूर्व में चैत्र कृष्ण-चतुर्थी को यहीं के मुहल्ला भेलूपुर में जन्म ग्रहण किया था। जैन धर्म के ही ग्वारहवें तीर्थकर श्रेयांसनाथ ने भी सारनाथ में जन्म ग्रहण किया था और अपने अहिंसा-धर्म का चतुर्दिक प्रसार किया था। अत जैन तीर्थस्थान के रुप में भी काशी का बहुत अधिक महत्व है। बौद्ध धर्म के तीर्थ स्थान के रुप में सारनाथ विश्वविख्यात है। भगवान गौतम बुद्ध ने गया में सम्बोधि प्राप्त करने के पश्चात् सारनाथ में आकर धर्मचक्र प्रवर्तन किया था। आर्यो की संस्कृति के कार्य-कलापों का मुख्य केन्द्र काशी सदैव से वि स्तर का आकर्षण स्थल रहा है। महाप्रभु गुरुनानक देव, कबीर जैसे लोगों के पावन-स्पर्श से काशी का कण-कण तीर्थ स्थल बन चुका है। भगवान शिव को वाराणसी नगरी अत्यन्त प्रिय है। यह उन्हें आनन्द देती है। अतः यह आनन्दकानन या आनन्दवन है।

 

काशी तथा वाराणसी का तीर्थ स्वरुप :- तीर्थ के रुप में वाराणसी का नाम सबसे पहले महाभारत मे मिलता है

अविमुक्तं समासाद्य तीर्थसेवी कुरुद्वह।
दर्शनादेवदेस्य मुच्यते ब्रह्महत्यया ।।
(महाभारत, वन., ८४/१८)
ततो वाराणसीं गत्वा देवमच्र्य वृषध्वजम्।
कपिलाऊदमुपस्पृश्य राजसूयफलं लभेत् 
(महाभारत, वन., ८२/७७)

बात तो यह है कि इसके पूर्व के साहित्य में तीर्थे के विषय में कुछ कहा ही नहीं गया है। उस समय धार्मिक केन्द्र कुरुक्षेत्र था, परन्तु देश-भर में आर्य लोगों को जाकर बसना था। वर्तमान तीर्थ स्थलों में बहुधा जंगल थे जिनमें आदिवासियों की इधर-उधर कुछ बस्तियाँ छिटपुट बसी थीं। इनके अतिरिक्त वहाँ मनुष्यों का निवास ही नहीं था। आगे चलकर जब भारत में सर्वत्र आर्य लोग फैल गये और उनके नगर बस गये, तब अध्यात्मिक सर्वेक्षण के द्वारा तीर्थों के अस्तित्व तथा माहात्मय का पता चला। इस संबंध में महाभारत में कहा गया है कि जिस प्रकार शरीर के कुछ अवयव पवित्र माने जाते है, उसी प्रकार पृथ्वी के कतिपय स्थान पुण्य प्रद तथा पवित्र होते है। इनमें से कोई तो स्थान की विचित्रता के कारण कोई जन्म के प्रभाव और कोई ॠषि-मुनियों के सम्पर्क से पवित्र हो गया है :-

भौमानामपि तीर्थनां पुणयत्वे कारणं ॠणु।
यथा शरीरस्योधेशा: केचित् पुण्यतमा: समृता:।
तथा पृथिव्यामुधेशा: केचित् पुण्यतमा: समृता:।।
प्रभावाध्दभुताहभूमे सलिलस्य च तेजसा।
परिग्रहान्युनीमां च तीर्थानां पुण्यता स्मृता।। 
(महाभारत, कृ.क.त., पृ. ७-८)

आधुनिक विचार धारा इस बात को इस प्रकार कहती है कि जहाँ-जहाँ मानव के बहुमुख उत्कर्ष के साधन लभ्य हुए, वहीं-वहीं तीर्थों की परिकल्पना हुई। जो कुछ भी हो, विविध तीर्थों के नाम और उनके माहात्म्य सबसे पहले पुराण-साहित्य में मिलते हैं, जिनमें महाभारत का शीर्षस्थ स्थान है। यजुर्वेदीय जाबाल उपनिषद में काशी के विषय में महत्वपूर्ण उल्लेख है, परन्तु इस उपनिषद् को आधुनिक विद्वान उतना प्राचीन नहीं मानते।

अविमुक्तं वै देवानां देवयजनं सर्वेषां भूतानां ब्रह्मसदनमत्र हि जन्तो: प्राणोषूत्क्रममाणेषु रुद्रस्ताखं ब्रह्म व्याचष्टे येना सावमृततीभूत्वा मोक्षीभवती तस्मादविमुक्तमेव निषेविताविमुक्तं न विमुञ्चेदेवमेवैतद्याज्ञवल्क्यः।
(जबाल-उपनिषद्, खं. १)

जाबाल-उपनिषद् खण्ड-२ में अव्यक्त तथा अनन्त परमात्मा के संबंधमें विचार-विमर्श करते हुए महर्षि अत्रि ने महर्षि याज्ञवल्क्य से पूछा कि उस अव्यक्त और अनन्त परमात्मा को हम किस प्रकार जानें। इस पर याज्ञवल्क्य ने कहा कि उस अव्यक्त और अनन्त आत्मा की उपासना अविमुक्त क्षेत्र में हो सकती है, क्योंकि वह वहीं प्रतिष्ठित है। उस पर अत्रि ने पूछा कि अविमुक्त क्षेत्र कहाँ है। याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया कि वह वरणा तथा नाशी नदियों के मध्य में है। वह वरणा क्या है और वह नाशी क्या है, यह पूछने पर उत्तर मिला कि इन्द्रिय-कृत सभी दोषों का निवारण करने वाली वरणा है और इन्द्रिय-कृत सभी पापों का नाश करने वाली नाशी है। वह अविमुक्त क्षेत्र देवताओं का देव स्थान और सभी प्राणियों का ब्रह्म सदन है। वहाँ ही प्राणियों के प्राण-प्रयाण के समय में भगवान रुद्र तारक मन्त्र का उपदेश देते है जिसके प्रभाव से वह अमृती होकर मोक्ष प्राप्त करता है। अत एव अविमुक्त में सदैव निवास करना चाहिए। उसको कभी न छोड़े, ऐसा याज्ञवल्क्य ने कहा है।

जाबालोपिनषद के अतिरिक्त 'लिखितस्मृति', 'श्रृंगीस्मृति' तथा 'पाराशरस्मृति' में भी काशी के माहात्म्य का वर्णन किया गया है। ब्राह्मीसंहिता तथा सनत्कुमारसंहिता में भी यह विषय प्रतिपादित है। प्राय सभी पुराणों में काशी कामाहात्म्य कहा गया है, यद्यपि उनके क्षेत्रिय विकास के कारण उनमें विषय के विस्तार में भेद है। ब्रह्मवैवर्त्तपुराण में तो काशी क्षेत्र के विषय में 'काशी-रहस्य' नाम एक पूरा ग्रन्थ ही है, जो उसका 'खिल' भाग कहा जाता है। इसी प्रकार, पदमपुराण में काशी-महात्म्य नामक ग्रन्थ है, यद्यपि उसके अतिरिक्त अन्यत्र भी काशी का वर्णन मिलता है। प्राचीन लिंगपुराण में सोलह अध्याय काशी की तीर्थों के संबंध में थे। वर्त्तमान लिंगपुराण में भी एक अध्याय है। स्कन्दपुराण का काशीखण्ड तो काशी के तीर्थ-स्वरुप का विवेचन तथा विस्तृत वर्णन करता ही है। इस प्रकार पुराण-साहित्य में काशी के धार्मिक महात्म्य पर सामग्री है। इसके अतिरिक्त, संस्कृत-वाड्-मय में भी कहीं-कहीं कुछ-न-कुछ सामग्री मिलता ही है। दशकुमारचरित, नैषध तथा राजतरंगिणी में काशी का उल्लेख है और कुट्टनीपतम् में भी काशी के प्रधान देवायतन का सटीक वर्णन मिलता है, यद्यपि उस ग्रन्थ का उद्देश्य दूसरा ही है।

इन सभी आधारों पर काशी का धार्मिक महत्ता स्थापित है। इस संबंध में काल क्रम को लेकर चलना संभव नहीं है, क्योंकि पुराणों में निरन्तर परिवर्तन तथा परिवर्द्धन होते आये हैं और एक ही पुराण के भिन्न-भिन्न अंश भिन्न-भिन्न समय में बने हैं। लिंगपुराण इसका स्पष्ट प्रमाण है, क्योंकि बाहरवी शताब्दी ईसवी तक प्राप्त होने वाले लिंग पुराण में तीसरे अध्याय से अट्ठारहवें अध्याय तक काशी के देवायतनों तथा तीर्थें? का विस्तृत वर्णन था उसका बहुत-सा अंश लक्ष्मीधर के 'कृत्यकल्पतरु' में उद्धत होने से बच गया है जो ९ पृष्ठों का है। 'त्रिस्थलीसेतु' नामक ग्रन्थ की रचना के समय (सन् १५८० ई.) लिंगपुराण का कुछ छोटे-मोटे परिवर्त्तनों के साथ वही स्वरुप था, जैसा उसमे स्पष्ट लिखा है। कि लैंङ्गोडपि तृतीयाध्यायात्षोऽशान्तं लिंङ्गान्युक्तवोक्तम्, अर्थात लिंगपुराण में भी तीसरे अध्याय से सोलहवें अध्याय तक लिंगो का वर्णन करने के बाद कहा गया है कि ( से. पृ. १८१) वर्तमान लिंग पुराण में केवल एक ही अध्याय काशी के विषय में है, जिसमें केवल १४४ श्लोक हैं। पुराणों की इस परिवर्तन परम्परा के कारण उनके सहारे कालक्रम नही स्थापित किया जा सकता, अतएव इस विषय का स्वतन्त्र विवेचन सम्भव है। 
संसार के प्रत्येक धर्म के अपने-अपने तीर्थस्थान है। जिनकी यात्रा से कु लाभ होना माना जाता है। भारतवर्ष के तीर्थें? की संख्या भी उसकी भौगोलिक विशालता के अनुरुप है। महाभारत मे ही उनकी संख्या छोटी नहीं है और यदि सभी पुराणों के आधार पर सूची बनाई जाय, तो वह बहुत ही बड़ी हो जाती है। 'शब्दकल्पहुम' मे २६४ तीर्थों का उल्लेख है। परन्तु महिमा के विचार से भारत के तीर्थों में चार धाम और सात पुरियों के नाम शीर्षस्थ माने जाते है। प्रयाग का नाम इनमें नहीं आता, परन्तु वह तो तीर्थराज है। इसी प्रकार गया का नाम भी इसमें नहीं है और नही ही गंगा सागर का नाम मिलता है। एक बात और भी है कि तीर्थों के महात्म्य समय-समय पर बदलते भी रहे है खास कर गहडवाल युग में तो काशी में तीर्थों की बाढ़ सी आ गई।

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वाराणसी में तीर्थ क्षेत्र

भारतीय जीवन में तीर्थयात्र का विशेष महत्व है भारतीय तत्व चिंतन का आधार-भूत सिद्धांत है मोक्ष, जिसके फलस्वरुप कर्मक्षय के बाद पुनर्जन्म नहीं होता है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए शास्र विधि के कठिन नियमों का पालन करना आवश्यक है। इनमें पूजा, प्रतिष्ठा और दान इत्यादि आ जाते है। पर भारतीय तत्व चिंतन और प्रकृति का घनिष्ठ संबंध बहुत प्राचीन काल से अविच्छिन्न रुप से चला आ रहा है, जिसके फलस्वरुप ॠषियों ने वन, पर्वत तथा नदियों में ईश्वर का रुप देखा। देवों और मनीषियों की संगति से प्रकृति के उन ब्राह्म स्वरुपों में एक अजीव आकर्षण आ गया जीससे ऐतिहासिक काल में वे तीर्थ रुप मे परिणत हो गये। उन स्थानों में मन्दिर बनने लगे लोक विश्वास में नदियाँ देवियाँ मानी जाने लगीं तथा उनके उद्गम देवी प्रेरणा के द्योतक बन गये। क्रमशः जल न केवल भौतिक शरीर के मलों को ही साफ करने वाला माना गया, उसका सम्बध मानसिक विकारों को दूर करने वाला बतलाया गया तथा कर्मज्ञय का प्रतीक बन गया। नदियों तथा ॠष्याश्रमों से निकली हुई ज्योति उनके निकट किये गए कर्मो तथा यज्ञ श्राद्ध और पिंडदान इत्यादि के फलों को परिपुष्ट करने वाली मानी गयी। हिन्दू विश्वास के अनुसार पवित्र नदियाँ संसार को पार करने के लिए घाट के समान है और इसीलिए उनका नाम तीर्थ पड़ा। क्रमशः नदियों का यह फल तीर्थ क्षेत्रों और नदियों के किनारे बने देवालयों में भी निहित हुआ तथा देव दर्शन और नदी स्नान का पुण्य यज्ञ पुण्य के बराबर ही माना गया और वह भी कम खर्च में। तीर्थयात्रा केवल इस देश में ही नहीं, प्राय सब देशों और कालों में विद्यमान थी। आधुनिक युग में तीर्थयात्रा का उद्देश्य केवल आद्यात्मिक न होकर ऐतिक-सा होता है। प्राचीन सुग में भी कुछ ऐसा ही था और शायद ऐहिकता से मुक्त करने के लिए ही तीर्थ-महात्मयों की रचना हुई। तीर्थ-यात्रा का फल यज्ञफल से भी अधिक माना गया यज्ञ में सामग्री और दक्षिणा में काफी खर्च होता था, इसके विपरीत तीर्थयात्रा में कम तथा उसमे भूत, स्रियाँ विधवाएँ, चारों आश्रम के लोग, अग्नि होती इत्यादि यहाँ तक कि सब धर्मों से बहिष्कृत चाण्डाल तथा समाज के सब प्राणी समान भाव से भाग ले सकते थे। 

कुछ तीर्थ महात्म्यों में तो यहाँ तक कहा गया है कि तीर्थों में गम्यागम्य संबंधी नियम दूर हो जाते है। प्राचीन काल में तीर्थ-याक्षियों से कोई कर वसूल नहीं किया जाता था तथा उनकी मदद के लिए लोग धर्मशालाएँ तथा घाट बनवाकर, रास्तों में वृक्षारोपण करके तथा अन्न सत्र चलाकर उनके पुण्य में भागी होते थे।

पुण्य स्थल होने से पापी और पुण्यात्मा सभी को समान रबप से तीर्थयात्रा विहित थी। इसके फलस्वरुप तीर्थयात्रा अपराधियों के अड्डे बन गये जैसा कि वाराणसी के इतिहास से पता चलता है। 

तीर्थयात्रियों के वेष में गुप्तचर तीर्थे मे इसलिए भेजे जाते थे कि वहाँ जाकर वे विद्रोहियो शत्रुओं और चोरों का पता लगावें। सड़कों पर तीर्थयात्रियों की रक्षा में भी राज्य का काफी खर्च होता था पर उस खर्च का कुछ हिस्सा तीर्थों के व्यापारियों पर लगने वाले कर वसूल हो जाता था। तीर्थ यात्री ताम्र मुद्रा, ताम्र कंकण तथा काषापस्त से भूषित होते थे। पर यह वेष बहुधा ठग भी धारण कर लेते थे। वायु पुराण के अनुसार अश्रधालु, पापी, नास्तिक छिन्न संशय और हेतु निष्ठ तीर्थ फल के भागी हो सकते थे।

तीर्थफल का पुण्य यज्ञपुणय के समान ही माना गया है, पर यह पुण्य तीर्थों की महिमा के अनुसार कुछ कम अथवा कुछ अधिक होता था। एक मत से यज्ञ कर्म ही इहलोक और परलोक को साधने वाला माना गया है पर दूसरे मत के अनुसार वह बिना श्रद्धा के फलदायक नहीं हो सकती, उसके लिए दृढ़ संकल्प की आवश्यकता है तथा रास्ते की कठिनाइयाँ जैसे पैदल यात्रा उपवास इत्यादि केवल संकल्प की द्योतक थीं। तीर्थ स्थान इत्यादि तो तीर्थ यात्रा के ब्रह्म उपकरण मात्रा थे परमानन्द की प्राप्ति तो यात्रियों का आत्मचिंतन और निर्विकार भाव था। इसीलिए मन तथा सात्विक गुणों को भी तीर्थ माना गया है। बिना मनः शुद्धि के तीर्थयात्रा बेकार है। हृदय से शुद्ध तथा ज्ञानपूत व्यक्ति को ही परमगति प्राप्त होती है। गोविन्द चन्द्र देव के मंत्री लक्ष्मीघर ने कृत्य कल्पतरु के तीर्थ विवेचन काणड में तीर्थ यात्रा संबंधी इसी मत की संपुष्टि की है।

तीर्थयात्रा की फलश्रुतियों से तो ऐसा पता चलता है कि तीर्थ मानो ऐसे जादू है जिनसे मनुष्य तुरन्तु भवबन्धन से छूट जाता है, पर बात ऐसी नहीं है। इन्द्रिय-निग्रह, योग, तप, शुद्धाहार, ब्रह्मचर्म ब्रत नियम इत्यादि पुराणों के अनुसार मुक्ति के साधन माने गये है तथा मनः शुद्धि के लिए श्रवण मनन और ध्यान। तीर्थयात्रा भी उन्हीं नियमों के मानने से फलदायिनी हो सकती है। पुराणकारों का यह विश्वास ही ऐहिक और पारलौकिकसुखों की प्राप्ति का साधन है। तीर्थों में देवॠण, पितृॠण और ॠषिॠण से मुक्ति मिलती है। वहाँ होम, पूजा, यज्ञ, ॠषितपंण, पितृतपंण, दवोच्चार, पिंडदान और श्राद्ध का विशेष महत्त्व शायद इसीलिए माना गया है कि ये कर्म तीर्थों में घर की अपेक्षा अधिक निश्चिन्ततापूर्वक और श्रद्धापूर्वक किये जा सकते है। इसमें संदेह नहीं कि लोक विश्वासों के फलस्वरुप तीर्थयात्रा की महिमा वास्तविकता छोड़कर आकाश में पहुँच गयी है जो नित्य भीम और मानसी तीर्थों में अवगाहन करते है। एक दूसरे उद्धरण से पता चलता है कि जो यात्री काम क्रोध और लोग पूरी करता है, उसके लिए कुछ भी अप्राप्य नहीं। जो तीर्थ अगम्य और विषम है वे ध्यान मात्र से उपलब्ध हो जाते हैं। तीर्थों में केवल शुद्धात्माओं को मुक्ति मिलती है, ढ़ोंगी और पापियों को नहीं। 

भारतीय विचारधारा में तीर्थों की परम्परा काफी प्राचीन मालूम पड़ती है और इसका आरम्भ वैदिक काल से होता है जिसमें जल को पवित्र और जीवनदायिनी-शक्ति-युक्त माना गया है। ॠग्वेद काल से ही नदियाँ देवतुल्य मानी जाने लगीं। एकांत स्थान होने से उनके सान्निध्य में तप और ध्यान करने की सुगमता पर विशेष ध्यान करने दिया गया। गोतम (२०/१५) ने नदियों के संबंध में तीर्थ शब्द का प्रयोग किया है तथा कुछ नदियों और दों के जल में पूतदायिनी शक्ति माना है (गौतम, २०/१०) विष्णु स्मृति (३०/६) में तीर्थ यात्रा का फल अश्वमेघ यज्ञ के समान माना गया है तथा दूसरी जगह (विष्णु, ५/१३१) पुष्करादि तीर्थो में यज्ञ, तप, पिंड और श्राद्ध की महत्ता बतलायी गयी है तथा गंगा जल (विष्णु, ५३/१७) की सर्वश्रेष्ठता स्वीकार की गयी है। गंगा में अस्थि प्रवाह पुण्यदायक माना गया है। विष्णु स्मृति (१९/१०/१२) में गंगा तथा कुरुक्षेत्र की यात्रा पुण्यदायिनी कही गयी है। वृहस्पति स्मृति तथा याज्ञवल्क्य स्मृति ने गया श्राद्ध के महत्व पर लोगों का ध्यान आकर्षित किया है। आश्लायन (१२/६) और लाटयायन (१०/१५ इत्यादि) श्रौतसूत्रों में सरस्वती के किनारे यजन-याजन का महत्त्व बतलाया गया है तथा कात्यायन श्रौत सूत्र (२४/१०)के अनुसार सत्र समाप्ति के बाद यमुना अथवा करपचा में स्नान फलदायक बतलाया गया है। 
रामायण तथा महाभारत में भी तीर्थ यात्रा पर प्रकाश डाला गया है। रामायण में मध्य देश की नहियों तथा जिन नदियों के किनारे राम पहूँचे तथा सेतुबंध के तैर्थिक महत्व का उल्लेख है। महाभारत में बलराम, पांडव और अर्जुन तीर्थ यात्रा करते है।

पुराण और उपपुराण तो तीर्थस्थल और क्षेत्र-माहात्मयों से भड़े पड़े है। यह ध्यान देने योग्य बात है कि लक्ष्मीधर अग्नि, भागवत, गरुड़, कूर्म, नारदीय, शिव और सौर पुराणों का उल्लेख नहीं करते। वे अपने विचार अधिकतर आदित्य, देवी, कालिका और नारासिंह उपपुराणों के आधार पर प्रकट करते है। श्री आयंगर ।१० की राय में वे कुछ तीर्थों का वर्णन करते है और बाकी को छोड़ देते है। इससे यह अनुमान होता है कि वे कुछ तीर्थों को अधिक पवित्र मानते थे और बाकी को नहीं। यह भी संभव है कि पुराणों के जो पाठ उनके सामने थे उनमें वह सामग्री नहीं थी जो अब मिलती है।

तीर्थप्रकरण में तो वाराणसी तीर्थ यात्रा संबंधी सामग्री भरी पड़ी है जिसकी जाँच पड़ताल से यह पता चल जाता है कि पुराणों के आधुनिक संस्करणों में कौन-सी-बात परवर्ती है। उदाहरण के लिए वराणसी की पंच कोशी का उल्लेख लक्ष्मीधर ने नाना तीर्थ माहात्म्य अध्याय में पुरी की प्रदक्षिणा के नाम से किया है। प्रक्षिणी पुरी पूञ्या विमुक्त केशवौ- (२३७-१२) यह सही है कि काशी विषयक वर्णन में इस यात्रा का उल्लेख नहीं है। चार सौ वर्ष से अधिक समय से स्कंद पुराण काशी खण्ड के कुछ संस्करणों में ही इसका उल्लेख मिलता है।

निबंध के रुप में तीर्थ यात्रा संबंधी उल्लेखों का चयन सबसे पहले लक्ष्मीधर ने किया। ऐसा जान पड़ता है कि गहडवाल युग में पौराजिक हिन्दू-धर्म और अधिक मजबूत हो गया। गोविन्दचन्द्र की राज्य सीमा में ही अधिकतर तीर्थ थे, इसलिए एक ऐसे निबंध की आवश्यकता पड़ी जो उन तीर्थों के धार्मिक महत्व के लोगो के सामने रख सके। हर एक तीर्थ में स्नान, संकल्प, प्रार्थना, दान, जप, पूजा तथा पिंडदान, तपंण तथा श्राद्ध फलदायक माने गये। गंगा जल और मृत्तिका में अलौकिक गुणों की कल्पना की गयी तथा काशी की गियों में झाड़ लगाना पुण्य-कर्म माना गया। गंगाजल में अस्थि-प्रवाह मृत व्यक्ति के मोका का कारण बना। काशी में आजन्म प्रवास मुक्तिदायक था। यह विश्वास यहाँ तक बढ़ा कि पुराणों के अनुसार पत्थर से पैर तुड़वाकर काशी में बस जाना चाहिए। पुराणों ने आत्मघात को महापातक माना है पर सती प्रयाग में गंगा-यमुना के संगम पर डूब मरना, रोगग्रस्त तथा बृह शरीर का उपवास, डबने, पर्वत और अग्निपात से आत्मघात, ये महापातक की श्रेणी में नहीं आते।
लक्ष्मीधर के निबन्ध में तीर्थों में काशी का स्थान प्रथम माना गया है, इसका यही कारण नही है कि यह गाहर वालों की राजधानी थी क्योंकि बाहरवीं सदी तक तो काशी भारत का प्रधान तीर्थ बन चुकी थी। अलवेरुनी के अनुसार ग्यारहवीं सदी के आरम्भ में भारत के सब भागों से यहाँ साधु इकट्ठा होते थे। कुट्टनीमत के अनुसार आठवीं सदी में भी वाराणसी का वही रुप था जैसा कि बारहवीं सदी में था। राजधाट से मिली गुप्त युग की मृण्मुद्राएँ भी काशी के तीर्थ रुप को प्रकट करती है। गाहड़वाल सम्राट अपने को काशी का अधिपति मानने में गौरव मानते थे। वैष्णव होते हुए भी उनके अनेक दानपात्र शैव मंदिरों से जैसे देवश्वर, त्रिलोचनेश्वर, अधोरेश्वर, कृतिवासेश्वर, इन्द्रेश्वर, ओंकारेश्वर इत्यादि सम्बन्धित हैं। दसवीं सदी के दक्षिण भारतीय शिलालेखों से पता चलता है कि काशी में गो-ब्राह्मण बध से बढ़कर कोई दूसरा पाप नहीं था।

काशी अथवा वाराणसी कब से पवित्र मानी गयी इसका ठीक पता नहीं चलता क्योंकि बौद्ध साहित्य में तो इसके राजनीतिक और व्यापारिक पहलुओं पर तथा काशी प्रदेश में प्रचलित यज्ञ और नागपुजा के ही विशेष उल्लेख है काशी की व्युत्पति मनु के पौत्र पुरुखा से सातवीं पीढ़ी में उत्पन्न काश से मानी जाती है। इसी वंश में वैद्यक शास्र के अधिष्ठाता धन्वन्तरि हुए। कौशीत की उपनिषद् में (एस. बी. ई., १/१३००-७१५, १००-५) काशी के दार्शनिक राजा अजातशत्रु का उल्लेख है। हिरण्यकेशी गृहसूत्र (२/७/१०/७) में विष्णु, रुद्र स्कंद और ज्वर के साथ-साथ काशीश्वर की पूजा का भी उल्लेख है। इस उल्लेख के आधार पर शायद कहा जा सकता है कि ईस्वी पूर्व पाँचवी सदी में बनारस में शिवपूजा प्रारम्भ हो चुकी थी। ज्वर की पूजा से हमारा ध्यान अथर्ववेद (पैप्लाद शाखा, ५/२२/१४) के उस उल्लेख की ओर आकृष्ट होता है, जिसमें काशी, मगध और गंधार में मलेरिया के चले जाने की बात आयी है। लगता है, उस युग में वे प्रदेश मलेरिया से पीड़ित रहते थे। मनु (२/२१) के अनुसार मध्य प्रदेश प्रयाग ही तक सीमित था। तथा काशी उस प्रदेश के बाहर पड़ जाती थी। महाभारत (वनपर्व, ८१) के ही श्लोक में काशी का उल्लेख आया है। इसके अनुसार यात्री कोटि तीर्थ से वाराणसी पहूँचते थे और वहाँ शिव पूजा करके कपिलकुंड में स्नान करके अश्वमेघ का पुण्य लूटते थे। उसके बाद वे गंगा-गोमती के संगम पर स्थित मार्कण्डेय तीर्थ की यात्रा करते थे। पर इसमें संदेह नहीं कि पौराणिक धर्म की अभिवृद्धि और शैव धर्म के प्रसार से काशी की महत्ता का प्रचार हुआ।

गाहडवाल युग में वाराणसी राजधानी हो गयी, फलस्वरुप काशी की धार्मिक महत्ता और भी बढ़ी। लक्ष्मीधर ने अपने निबंध में इसी महत्ता को और बढ़ा-चढ़ा कर दिखलाया है तथा वाराणसी के करीब ती सौ चालीस मंदिरों का उल्लेख किया है। जो मंदिर बाहरवीं सदी के बाद बने उनके उल्लेख नारायण भ और मित्र मिश्र ने किये हैं। शिव की राजधानीमें शिव परिवार का भी होना आवश्यक है, इसीलिए इसमें अनेक नामों वाली पार्वती, नन्दी, विनायक और भैरव आ गए हैं। लक्ष्मीधर जिस प्राचीन लिंग पुराण के उद्धृत करतेहै उसके अनुसार देवताओं, देवियों, नागों असुरों और ॠषियों में काशी मे शिव मंदिर स्थापित करने की होड़ सी लगी थी। समयानतर में उन मंदिरो में स्थापकों की पूजा भी होने लगी।

लक्ष्मीधर द्वारा उद्धृत लिंग पुराण के विवरणों की बाद के पौराणिक विवरणों (काशी खण्ड, ब्रह्म वैवर्त) से तुलना करने पर यह बात साफ हो जाती है कि १६वीं सदी के लेखकों ने किस तरह प्राचीन मंदिरों के नये उद्देश्य दिखलाने के प्रयत्न किए। इसके दो कारण थे। पहला कारण यह है कि वारा णसी के प्रति ममता होने से तथा लोगों के सुदूर तीर्थों में जाने की अरुचि के कारण पुराण कारों ने वाराणसीमेंही उन तीर्थों के पर्यायवाची तीर्थ ढूँढ निकाले उदाहरणार्थ अस्सी संगम पर गाहडवाले युग में लोलाकेश्वर सूर्य का मंदिर था। काशी खण्ड ने इस कल्पना को प्रस्तारित करके काशी में द्वादश आदित्यों की कल्पना कर ली। उसी तरह जहाँ लिंगपुराण में पाँच विनायकों का उल्लेख है काशी खण्ड में उनकी संख्या छप्पन तक पहूँच गयी है। देव मंदिरों की संख्या किस तरह बढ़ रही थी इसका पता इसी बात से चलता है कि लक्ष्मीधर के समय में इनकी संख्या ती सौ पचास थी, पिंसेप के समय इनकी संख्या एक हो गयी और १८६८ ई. में जव शेटिंग ने अपनी पुस्तक लिखी इनकी सोलह सौ चौवन तक पहूँच गयी।

 

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वाराणसी वैभव


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