सांस्कृतिक सूचना प्रयोगशाला

सांस्कृतिक सांयन्त्रिक संचार (सीआईएल)

मल्टीमीडिया शोध केन्द्र Multimedia Research Centre

 
सांस्कृतिक सांयन्त्रिक संचार (Cultural Informatics Laboratory, in short सीआईएल) की स्थापना 1994 में, एक मल्टीमीडिया शोध केन्द्र के रुप में, यूएनडीपी द्वारा अनुमोदित ““नेशनल फेसिलिटी फार इन्टरएक्टिव मल्टीमीडिया डाक्यूमेंटेशन आफ कल्चरल रिसोर्सेज”. परियोजना के अन्तर्गत किया गया। यूएनडीपी परियोजना का सफलतापूर्वक समापन 2001 में हुआ। जिन क्षेत्रों में परियोजना ने नई जगह बनाई उनमें कला के विभिन्न प्रारूपों तथा सूचना तकनीकी के बीच सामंजस्य स्थापित करना एवं तदनुरूप मल्टीमीडिया का विकास और प्रदर्शन करना प्रमुख है। कम्प्यूटर विज्ञान, संस्कृत, वास्तु, कर्मकाण्ड, पुरातत्त्व, पुरालेख, ललितकला, संगीत कला, छायापट आदि के विद्वानों के सहभागिता से काम करना इस परियोजना की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।
 
विशेषज्ञों के तत्त्वावधान में मल्टीमीडिया टीम ने कला में सन्निहित ज्ञान का गहराई से विश्लेषण करने में विशेष दक्षता हासिल की। नये-नये प्रारूपों की कल्पना की गई और उसे विकसित कर मल्टीमीडिया के विभिन्न परियोजनाओं में प्रयुक्त किया गया। संस्कृति के समग्र और एकीकृत अवधारणा में, परम्पराओं को कम्प्यूटर के माध्यम से पुन: सृजन कर दर्शाना, इस इकाई के प्रमुख कार्यकलापों में है।
 
कम्प्यूटर, कला के विभिन्न आयामों को आसानी से समाहित करने में सक्षम है, अत: सीआईएल द्वारा विकसित विषयगत मल्टीमीडिया को केंद्र की गतिविधियों के समनुक्रम के अंतिम चरण में रखा गया है। सीआईएल के कार्यों को विषयगत मल्टीमीडिया सीडी/डीवीडी/पेन ड्राईव, कलासम्पदा (संस्थागत कम्प्यूटर नेटवर्क) तथा वेबसाईट के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है।
 
कई परियोजनाओं को विश्व स्तरीय विद्वानों के मार्गदर्शन में शुरु किया गया, जिनमें कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं:-
 

बृहदीश्वर मंदिर तंजावुर: यूनेस्को घोषित एक विश्व सांस्कृतिक धरोहर :

राजराज चोल के द्वारा सन् 1010 में तंजावुर (तमिलनाडु) में निर्मित बृहदीश्वर मंदिर, चोल कला और वास्तु का अद्भुत नमूना है। यूनेस्को ने सन् 1987 में इसे एक विश्व सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता प्रदान की। इस परियोजना के डीवीडी का लोकार्पण 6 दिसंबर 2013 को माननीय केन्द्रीय मंत्री श्री जयराम रमेश के द्वारा की गई।

गीत-गोविन्द

12वीं शताब्दी का जयदेव कृत गीत-गोविन्द मध्यकालीन भारत का प्राय: सबसे लोकप्रिय संस्कृत काव्य है। भारतवर्ष में ललित कला, संगीत कला, नृत्य कला का कोई भी ऐसा घराना नहीं है जो अपने प्रदर्शन में इस काव्य से अछूता हो। केन्द्र ने इसके छह अष्टपदीयों को लेकर तथा कला के विभिन्न प्रारुपों में उसके प्रदर्शन के साथ विद्वानों द्वारा इस काव्य की व्याख्या मल्टीमीडिया के माध्यम से दिखाने का प्रयत्न किया है । इस परियोजना का लोकार्पण 27 मई 2015 को श्री जवाहर सरकार, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, प्रसार भारती के द्वारा की गई।

बगड़ावत देवनारायण गाथा )(एक राजस्थानी लोकगाथा
अग्निचयन: (एक वैदिक अनुष्ठान)

विश्वरूप

केन्द्र के द्वारा निम्नलिखित मल्टीमीडिया सीडी/डीवीडी का भी प्रकाशन हो चुका है।

मुक्तेश्वर मंदिर

(चोद्ददानपुरा, उत्तर कर्णाटक)

रॉक आर्ट  

अजन्ता

टू पिलग्रिम्स:लिजाबेथ और एलिजाबेथ सास ब्रूनर की कला एवं जीवनी

देवदासी मुरई: Remembering Devadāsīs

यह पांडुलिपियों, स्लाइड, किताबें, ऑडियो और वीडियो के अपने वर्तमान भंडार को डिजिटल स्वरूप में सामग्री के प्रसार के एक केन्द्र बिन्दु के रूप में भी कार्य करता है। विभिन्न प्रकार की सामग्री के डिजिटलीकरण के लिए पालन किए जा रहे डिजिटाइजेशन मानकों को भी यहाँ उपलब्ध कराया गया है, जिसे समय समय पर विशेषज्ञों कि सहायता से नवीनीकरण किया जाता है।

Man and Mask: रूप-प्रतिरूप

अन्य लिंक

Image from Agnicayana Project

श्रीमती नीना रंजन, आईएएस, राष्ट्रीय परियोजना समन्वयक, यूएनडीपी परियोजना द्वारा पूर्व राष्ट्रपति श्री के.आर. नारायणन को मल्टीमीडिया सीडी-रॉम प्रस्तुत करते हुए