जनपद-सम्पदा

इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र की वैचारिक योजना से उभरते हुए, 1988 में जनपद संपदा के संकाय की स्थापना की गई। यह कला कोष ,के कार्यक्रमों का पूरक है, तथा कला को उनके पारिस्थितिक-सांस्कृतिक और सामाजिक-आर्थिक संदर्भों में समझने के प्रयोजनार्थ है। यह मौखिक परंपरा पर ज़ोर देता है जो वास्तव में साक्षर परंपरा का अनुस्थापन करता है। यहाँ सिद्धांत और व्यवहार, मौलिक और मौखिक, वाचिक, दृश्यात्मक और गत्यात्मक को संपूर्ण लाक्षणिक रूप में देखा जाता है, न कि एकत्रित किए जाने वाले मदों के रूप में। जन, लोक, लौकिक, मौखिक, शास्त्र, प्रयोग, क्षेत्र, परंपरा, आदि, दृश्य, श्रव्य आदि भारतीय शब्द, जनपद संपदा कार्यक्रमों को विकसित करने के लिए निर्णायक शब्दों के रूप में काम करते हैं।

 

संकाय की प्रमुख चिंता ग्रामीण छोटे पैमाने के समाज की समृद्ध बहुरंगी विरासत है। अनुसंधान विषय के पारंपरिक अर्थ में यह विभिन्न उप-विषयों सहित दो क्षेत्रों से संबद्ध है: नृविज्ञान तथा पुरातत्व। तथापि, जनपद संपदा के लिए प्रयुक्त शोध पद्धति पारंपरिक मानविकी और सामाजिक विज्ञान के विषयों से भिन्न है। दृष्टिकोण पूर्णतावादी है, और उसके सैद्धांतिक आधार-वाक्य के रूप में, ऐतिहासिक तौर पर नहीं,बल्कि व्यवस्थित रूप से एक नए शास्त्र तथा प्रयोग, वाचिक और मौखिकसातत्य का निर्माण किया जा रहा है। बेशक़, उसने अभी तक कोई नया सिद्धांत अभिकल्पित नहीं किया है, लेकिन एक नए सिद्धांत के निर्माण के लिए कुछ विचार और अनुभव संग्रहीत किया है।

 

संकाय का एक, जीवन-शैली अध्ययन, मल्टी-मीडिया प्रस्तुतिकरण और कार्यक्रम, तथा बाल जगत के रूप में वर्गीकृत क्रमादेशित स्वरूप है, जिनमें से प्रत्येक में असंख्य उप-कार्यक्रम मौजूद हैं। यह रिपोर्ट उसके अनुसंधान क्रियाकलाप के मुख्य क्षेत्रों की रूपरेखा प्रस्तुत करता है, और पहल दस वर्षों की प्रमुख उपलब्धियों को इंगित करता है।