वाराणसी क्षेत्रीय केंद्र

केन्द्रीय उच्च तिब्बती अध्ययन संस्थान, सारनाथ के अंतर्गत एक परियोजना के तहत इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, वाराणसी ने अपनी यात्रा 1987 में आरंभ की थी और डॉ. बेट्टिना बॉमर के सक्षम नेतृत्व में सक्रिय शोधकर्ताओं और कर्मचारियों के एक समूह के साथ 1988 में इसने एक स्वतंत्र संस्थान का दर्जा हासिल कर कला, मानविकी और सामान्य सांस्कृतिक विरासत से संबंधित संदर्भ कार्य, शब्दावली, शब्दकोश और एनसाइक्लोपिडिया पर शोध एवं उनके प्रकाशन के लिए कलाकोश प्रभाग, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली के शाखा कार्यालय के रूप में काम करना शुरू किया।

शुरू में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, वाराणसी का मुख्य कार्य था कलातत्त्वकोश (लगभग 25 खंडों में) तैयार कर प्रकाशित करना जिसमें भारतीय कला की मूल अवधारणा पर लगभग 250 शब्दावलियां हैं। अब तक छ्ह खंड प्रकाशित हो चुके हैं; सातवां और आठवां खंड प्रकाशनाधीन हैं। कलातत्त्वकोश के अतिरिक्त केन्द्र द्वारा कलामूलशास्त्र श्रृंखलाओं के कुछ पाठों का संपादन, महत्वपूर्ण कला शब्दावलियों की सूची तैयार करने और सबसे बढ़कर विशेषज्ञों की मदद से इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अन्य परियोजनाओं के लिए भारत विद्या संबंधी विभिन्न संकायों से संदर्भ संकलन जैसे अन्य क्रियाकलाप भी चलाए जा रहे हैं। इसके आलावा, यह सावधिक व्याख्यानों, सेमिनारों, बैठकों और कार्यशालाओं का भी आयोजन करता है।

अपनी 20 वर्षों की यात्रा के दौरान इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, वाराणसी का संपर्क चार विशेषज्ञ संयोजकों से हुआ। 1988 से लेकर 1995 तक इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, वाराणसी में काम करने वाले डॉ. बेट्टिना बॉमर प्रथम संयोजक थे। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, वाराणसी में संयोजक के रूप में उनके कार्य काल के दौरान कलातत्त्वकोश खंड I-III प्रकृति, खंड III (सेमिनार खंड) तथा शीलपरंतनकोश का प्रकाशन किया गया जिनका संपादन डॉ. बेट्टिना बॉमर द्वारा किया गया।

अप्रैल 1995 में प्रो. आर.सी. शर्मा ने इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, वाराणसी के मानद संयोजक का कार्य भार संभाला और अपने पद पर वह जुलाई, 2003 तक बने रहे। इस अवधि में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, वाराणसी ने कलातत्त्वकोश खंड IV एवं V, कलातत्त्वकोश खंड I एवं II के संशोधित संस्करण तथा ए.के. कुमारस्वामी के ‘वेदों की अवधारणा’ प्रकाशित की।

2003 में, प्रो. वी.एन. मिश्र इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, वाराणसी के मानद संयोजक बने और इसी पद बने रहते हुए, 14.02.2005 को उनकी मृत्यु हुई। उनके कर्यकाल में, कलातत्त्वकोश खंड VI तैयार हुआ। कलातत्त्वकोश खंड VI के अलावा इस अवधि में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, वाराणसी द्वारा आपके मार्गदर्शन में महत्वपूर्ण कला शब्दावलियों की सूची तैयार करने की परियोजना शुरू की गई जो अब पूरा होने को है।

जून 2007 में प्रो. के.डी. त्रिपाठी इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, वाराणसी के मानद संयोजक नियुक्त हुए। इस समय तक इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, वाराणसी का दर्जा बढ़कर क्षेत्रीय केन्द्र का हो गया। अगस्त 2008 में सदस्य सचिव ने उन्हें सलाहकार के पद पर पदोन्नत कर दिया। संस्थान ने सितंबर 2007 में विद्वानों की एक विशाल सभा आयोजित की और फिर दिसंबर 2007 के अंतिम सप्ताह में प्रकाशित होने वाले कलातत्त्वकोश खंडों की समीक्षा और विश्लेषण के लिए कलातत्त्वकोश पर तीन दिवसीय व्याख्यानमाला का आयोजन किया। 2008 के अक्टूबर और नवम्बर महीने में स्थान-आयतन और प्रतीक –अभिप्राय के आधार पर दो कलातत्त्वकोश संगोष्ठियों का आयोजन किया गया। इसी वर्ष डॉ. एस. चट्टोपाध्याय और डॉ. एन. सी. पांडा के संपादन में कलातत्त्वकोश VI प्रकाशित हुआ।

कलातत्त्वकोश के शेष सातवें और पन्द्रहवें खंडों की तैयारी के अतिरिक्त इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, वाराणसी ने अपने क्रियाकलाप का विस्तार किया। उस तयशुदा योजना में एक निरंतर सेमिनार की योजना वाक्यपदीय और भारतीय भाषा दर्शन पर एक सेमिनार आयोजित किया गया जिसने न केवल वाक्यपदीय की काशी परंपरा को सुरक्षित रखने का प्रयास किया बल्कि पाठ्य पर अब तक किए गए सभी कार्यों का सर्वेक्षण भी किया। परियोजना का मकसद था संपूर्ण भाषायी दर्शन के संदर्भ में वाक्यपदीय का परीक्षण करना। उस श्रृंखला में पिछले साल इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, वाराणसी ने वाक्यपदीय पर तीन व्याख्यान मालाओं का आयोजन किया जिसमें विषय के विशेषज्ञों द्वारा तीन चरणों में कम से कम 20 व्याख्यान दिए गए। इस वर्ष भी वाक्यपदीय और भारतीय भाषा दर्शन पर एक चार-दिवसीय व्याख्यानमाला जनवरी, 2009 में आयोजित किए जाने का कार्यक्रम है।

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